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नृसिंह जयंती 2025: जानें नृसिंह अवतार से जुड़े दिलचस्प पहलू

नृसिंह जयंती 2023: जानें नृसिंह अवतार से जुड़े दिलचस्प पहलू

हिन्दू धर्म में अपना एक विशेष महत्व रखने वाली नृसिंह जयंती वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनार्इ जाती है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा करने के लिए नृसिंह अवतार लिया और दैत्यों के राजा हिरण्यकश्यप का वध किया। इसी कारण इस दिन को नृसिंह जयंती के रूप में मनाया जाता है। तो आइए जानते है नृसिंह अवतार और नृसिंह चतुर्दशी की व्रत-विधि के बारे में।

नरसिंह जयंती 2025 तारीखः रविवार, 11 मई 2025

नृसिंह जयंती कथा

भगवान विष्णु ने अधर्म का नाशकर धर्म की स्थापना करने के लिए कई अवतार लिए। जिनमें से एक है नृसिंह अवतार। पुराणों के अनुसार प्राचीन काल में कश्यप नामक ऋषि हुए थे। जिनकी पत्नी थी दिति। उनके दो पुत्र हुए, जिनमें से एक का नाम हिरण्याक्ष तथा दूसरे का नाम हिरण्यकश्यप था। हिरण्याक्ष को भगवान विष्णु ने वाराह रूप धरकर मारा। इससे क्रोधित हिरण्यकश्यप ने भार्इ की मृत्यु का बदला लेने के लिए अजेय होने का संकल्प करते हुए कई वर्षों तक कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रहमाजी ने उसे अजेय होने का वरदान दिया। अपने इस वरदान का दुरूपयोग करते हुए उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और देवता, ऋषि-मुनियाें और अामजन को यातनाएं देने लगा। इसी दौरान हिरण्यकश्यप की पत्नी कयाधु ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम प्रहलाद रखा गया। राक्षस कुल में जन्म लेने के बाद भी प्रहलाद में राक्षसों जैसे दुर्गुण नहीं थे। वो विष्णु भगवान का भक्त था और हर घड़ी उन्हीं का नाम जपता रहता था। जबकि हिरण्यकश्यप उसकी भक्ति के खिलाफ था, अपने पुत्र को उसने भगवान की भक्ति करने के लिए कई बार रोका लेकिन प्रहलाद निरंतर प्रभु की भक्ति करता रहा। इससे क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को मारने की ठान ली। लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद पर उसका हर वार खाली जाता। अंत में उसने प्रहलाद को अपनी बहन होलिका की गोद में बैठाकर जिंदा जलाने का प्रयास किया। दरअसल होलिका को वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती। लेकिन जब होलिका प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठी तो भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद तो बच गया और होलिका जल गई। इस घटना के बाद हिरण्यकश्यप का गुस्सा और बढ़ गया उसने प्रहलाद से पूछा कि बता, तेरे भगवान कहां है ? इस पर प्रहलाद ने कहा कि प्रभु तो सर्वत्र है, हर जगह विराजमान है, इस पर क्रोधित हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद से पूछा कि क्या इस खंभे में भी भगवान है, इस पर प्रहलाद ने हां में जवाब दिया। यह सुनकर हिरण्यकश्यपु ने खंभे पर प्रहार किया तभी खंभे को चीरकर नृसिंह भगवान प्रकट हुए और हिरण्यकश्यप को पकड़कर अपनी जांघों पर रखकर उसकी छाती को नखों से फाड़ ड़ाला आैर उसका वध कर दिया। नृसिंह भगवान ने प्रहलाद की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि आज के दिन जो व्रत करेगा वह समस्त सुखों का भागी होगा एवं पापों से मुक्त होकर परमधाम को प्राप्त करेगा। तभी से वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को नृसिंह जयंती के रूप में मनाया जाने लगा। ये महत्वपूर्ण दिन अपने भविष्य के बारे में जानने के लिए बेहतर समय हो सकता है ? खरीदें कोई भी प्रश्न पूछें रिपोर्ट आैर जवाब पाए।

नृसिंह जयंती व्रत-विधि

नृसिंह जयंती के दिन सूर्योदय से पहले उठना चाहिए, स्नानादि नित्य कर्म करने के बाद विधिवत नृसिंह भगवान की पूजा प्रारंभ करें। मंत्रोच्चार के बीच कुंकुंम, चंदन, केसर, नारियल, अक्षत, फल, पुष्प, प्रसाद अर्पण करें। पूजा के बाद आसन पर बैठकर भगवान नृसिंह का आशीर्वाद पाने के लिए नृसिंह गायत्री मंत्र का जाप करें। व्रत करने वाले श्रद्घालु को सामर्थ्य अनुसार तिल, स्वर्ण तथा वस्त्रादि का दान देना चाहिए। इस प्रकार सच्चे मन से नृसिंह जयंती का व्रत करने वाले श्रद्घालु की समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है। 2025 विस्तृत वार्षिक रिपोर्ट प्राप्त करें और अपने भविष्य के बारे में सब कुछ जानें।

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