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गंगा दशहरा 2025 : तारीख कहानी, महत्व और पूजा

गंगा दशहरा 2023 : तारीख कहानी, महत्व और पूजा

इस दिन गंगा नदी में डुबकी लगाने से नष्ट हो जाते हैं सारे पाप

गंगा दशहरा काफी महत्वपूर्ण दिन होता है। इसी दिन गंगा नदी के पृथ्वी पर उत्पत्ति होने की मान्यता है, इस कारण गंगा दशहरा के दिन दान और धर्म का खास महत्व होता है। चूंकि ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा की उत्पत्ति हुई थी, इसलिए दशमी तिथि को गंगा जंयती या गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है। इस साल गंगा दशहरा 5 जून 2025, गुरुवार को मनाया जाएगा।

गंगा दशहरा के दिन दान का है खास महत्व

मान्यता है कि गंगा दशहरा के दिन गंगा नदी में स्नान करने से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। श्रद्धालु इस दिन खास तौर पर इलाहाबाद, हरिद्वार, ऋषिकेश, वाराणसी, पटना और गंगासागर में डुबकी लगाते हैं। इसके अलावा कई अन्य स्थानों पर भी गंगा नदी में श्रद्धालु स्नान करते हैं। इस दिन दान का काफी महत्व होता है और कहा जाता है कि इस दिन पूजन या दान में शामिल किए जाने वाले वस्तुओं की संख्या दस में होनी चाहिए।

गंगा दशहरा पूजन विधि

गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान करने से मनुष्य के शरीर, मन और वचन इन दस प्रकार के पापों का शमन होता है।- गंगा नदी में स्नान न कर पाने की स्थिति में घर के पास ही किसी नदी या तालाब में स्नान किया जा सकता है। यदि वह भी संभव ना हो, तो माता गंगा का ध्यान करते हुए घर के पानी में गंगा जल मिलाकर स्नान-ध्यान करना चाहिए।- गंगा दशहरा के पूजन और दान में शामिल किए जाने वाले वस्तुओं की संख्या दस होनी चाहिए।- गंगा नदी में डुबकी भी दस बार लगानी चाहिए।- स्नानादि के बाद मां गंगा की पूजा करनी चाहिए।- इस दौरान गंगा जी के मंत्र का जाप करना लाभकारी होता है। – गंगा के साथ ही राजा भागीरथ और हिमालय देव की भी पूजा-अर्चना करनी चाहिए।- इस दिन खास तौर पर भगवान शिव की आराधना करनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने ही गंगा जी की तीव्र गति को अपनी जटाओं में धारण किया था।

गंगा अवतरण की पौराणिक कथा

गंगा दशहरा से जुड़ी पौराणिक कथा के मुताबिक प्राचीनकाल में अयोध्या के राजा सगर के साठ हजार पुत्र थे। एक बार अश्वमेघ यज्ञ करने की इच्छा से उन्होंने यज्ञ के घोडे को छोड़ दिया। इधर इन्द्र ने यज्ञ को असफल करने के उद्देश्य से अश्वमेघ के घोड़े को कपिल ऋषि के आश्रम में छिपा दिया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र इस घोड़े को ढूंढते हुए आश्रम पहुंचे, जहां उनके शोर से कपिल मुनी की तपस्या भंग हो गई। उन्होंने जैसे ही अपने नेत्र खोले राजा सगर के सभी साठ हजार पुत्र जलकर भस्म हो गए। मृतात्माओं की मुक्ति के लिए पहले राजा सगर, उनके बाद अंशुमान और उनके बाद महाराज दिलीप ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए घोर तपस्या की, लेकिन सफल नहीं हो सके। इसके बाद महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ ने गंगा को धरती पर लाने के लिए घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने वर मांगने को कहा तो भगीरथ ने गंगा जी को अपने साथ धरती पर ले जाने की बात कही। इसपर गंगा के तीव्र वेग से निजात पाने के लिए उन्होंने भगीरथ को भगवान शिव की तपस्या करने को कहा। समस्या के समाधान के लिए भगीरथ ने भगवान भोलेनाथ की तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर वरदान स्वरूप गंगा की तीव्र गति को अपनी जटाओं में रोकने को तैयार हो जाते हैं। इसके बाद उन्होंने गंगा को अपनी जटाओं में रोककर एक जटा को पृथ्वी की ओर छोड़ दिया। इस तरह गंगा पृथ्वी पर आयीं और भगीरथ अपने पूर्वजों को मुक्ति दिलाने में सफल हो सके।

गंगा दशहरा

बृहस्पतिवार, जून 5, 2025

पूजा का समय

दशमी तिथि प्रारंभ – जून 04, 2025 को 11:54 पी एम बजे

दशमी तिथि का समापन – जून 06, 2025 को 02:15 ए एम बजे

गणेशजी के आशीर्वाद सहित

आपका मार्गदर्शक

गणेशास्पीक्स डाॅट काॅम

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