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एकदंत संकष्टी चतुर्थी 2026: तारीख, समय, महत्व और पूजा विधि

Ekadanta Sankashti Chaturthi

हर महीने एक दिन ऐसा आता है जब भगवान गणेश विशेष रूप से अपने भक्तों के करीब आते हैं – वह है संकष्टी चतुर्थी। इन तेरह चतुर्थियों में से एक है एकदंत संकष्टी चतुर्थी। यह दिन भगवान गणेश के ‘एकदंत’ स्वरूप को समर्पित है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार यह वैशाख मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को पड़ती है। भविष्य पुराण और नरसिंह पुराण में इस व्रत की महिमा वर्णित है। यह भी माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर को इस व्रत का महत्व समझाया था।

एकदंत संकष्टी चतुर्थी 2026: तारीख और समय

विवरणतारीख / समय
दिन और तिथिमंगलवार, 5 मई 2026
पूजित स्वरूपचक्रराज एकदंत महागणपति
पीठश्रीचक्र पीठ
चतुर्थी आरंभ5 मई 2026, सुबह 05:24 बजे
चतुर्थी समाप्त6 मई 2026, सुबह 07:51 बजे

विशेष सूचना: इस व्रत में चंद्रोदय (चाँद निकलने) का समय अत्यंत महत्वपूर्ण है। व्रती चतुर्थी के दिन शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत खोलते हैं।  “अपने शहर के लिए चंद्रोदय का सही समय और पंचांग यहाँ देखें। अपना शहर चुनकर देखें कि शाम को चंद्रमा कब निकलेगा।

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महत्व: क्यों रखा जाता है एकदंत संकष्टी चतुर्थी का व्रत?

गणेश जी को हम ‘विघ्नहर्ता’ कहते हैं – रुकावटें हटाने वाले। लेकिन ‘एकदंत’ नाम के पीछे जो भाव छिपा है, वह और भी गहरा है। एकदंत यानी एक दांत – यह हमें सिखाता है कि जीवन में एकाग्रता और संयम ही सबसे बड़ी शक्ति है। जब हम अपनी सारी ऊर्जा एक लक्ष्य पर लगा देते हैं, तो कोई बाधा नहीं टिकती।

पौराणिक मान्यता के अनुसार गणेशा जी प्रथम पूज्य भगवान् है 

वैशाख मास की इस चतुर्थी को भगवान गणेश ने मदासुर नामक राक्षस का वध किया था। ‘मदासुर’ का मतलब है – अहंकार रूपी राक्षस। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारा सबसे बड़ा दुश्मन हमारा अपना घमंड है। जैसे एकदंत ने मदासुर को हराया, वैसे ही यह व्रत हमारे भीतर के अहंकार, ईर्ष्या और अभिमान को हराने की ताकत देता है।

इस व्रत के प्रभाव से:

  • सभी प्रकार के विघ्न दूर होते हैं
  • स्वास्थ्य, धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है
  • जाने-अनजाने में हुए पापों का नाश होता है
  • भक्त को स्वानंद लोक (गणेश जी का निज धाम) प्राप्त होता है

इसके अतिरिक्त, यदि चतुर्थी मंगलवार (अंगारक) को पड़े, तो उसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है – जो विशेष रूप से शुभ और दुर्लभ मानी जाती है।

पूजा विधि: कैसे करें एकदंत संकष्टी चतुर्थी की पूजा?

इस दिन चंद्र दर्शन का विशेष स्थान है। पूजा की मुख्य बातें नीचे दी जा रही हैं:

  • प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • गणेश जी की मूर्ति या चित्र को दूर्वा घास और ताजे पुष्पों से सजाएँ।
  • दीपक जलाकर वैदिक मंत्रों का उच्चारण करें।
  • सायंकाल में संकष्टी पूजा की जाती है। इसमें चंद्र देवता को अर्घ्य दिया जाता है – जल, चंदन, अक्षत और पुष्प से।
  • विशेष नैवेद्य के रूप में मोदक (नारियल और गुड़ से बना) तैयार करें। यह गणेश जी का अत्यंत प्रिय भोग है।
  • अंत में गणेश आरती करें और प्रसाद सभी भक्तों में वितरित करें।

व्रत के नियम – त्याग का संकल्प, 

व्रत एक त्याग का संकल्प है – अपने भगवान के प्रति एक प्रेमपूर्ण समर्पण।

  • जो चाहे, पूरा दिन निर्जला (बिना पानी) व्रत रख सकता है – लेकिन यह अनिवार्य नहीं।
  • जो न रख सके, वह फल, दूध, साबूदाना खिचड़ी ले सकता है।
  • गर्भवती, बुजुर्ग, बीमार या छोटे बच्चे – ये बिना किसी दबाव के आंशिक व्रत करें।

एक बात हमेशा याद रखिए – गणेश जी को आपकी भूख नहीं, आपकी श्रद्धा चाहिए। मन से की गई एक छोटी-सी पूजा भी स्वीकार हो जाती है।

गणेश जी के आठ अवतार और एकदंत का स्थान

गणेश पुराण और मुद्गल पुराण के अनुसार, भगवान गणेश ने आठ अवतार लिए। हर अवतार ने एक नकारात्मक शक्ति को नष्ट किया। यह तालिका देखिए – यह समझने में मदद करेगी कि ‘एकदंत’ कितने महत्वपूर्ण हैं:

अवतारराक्षस / उद्देश्यक्या नष्ट किया
वक्रतुंडमत्सरासुरईर्ष्या
एकदंतमदासुरअहंकार
महोदरमोहासुरमोह (आसक्ति)
गजाननलोभासुरलालच
लंबोदरक्रोधासुरक्रोध
विकटकामासुरवासना
विघ्नराजममतासुरममता (झूठा अपनापन)
धूम्रकेतुअभिमानासुरअभिमान

आप जरा सोच के देखिये – हमारे जीवन में ईर्ष्या, अहंकार, लालच, क्रोध – ये सब दिन-रात हमें घेरे रहते हैं। एकदंत संकष्टी चतुर्थी वह मौका है जब हम गणेश जी से प्रार्थना कर सकते हैं कि वे हमारा सबसे बड़ा राक्षस – हमारा अपना अहंकार – हमसे दूर कर दें। यह तालिका सिर्फ जानकारी नहीं, एक आईना है। देखिए, आप किस राक्षस से सबसे ज्यादा जूझ रहे हैं, और फिर इस चतुर्थी पर उसी को खत्म करने का संकल्प लीजिए।

पौराणिक कथा – जब एकदंत ने मदासुर का अहंकार तोड़ा

(यह कथा मुद्गल पुराण से ली गई है )

प्राचीन काल में मदासुर नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली राक्षस था। उसने हज़ारों साल तक कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से जब ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए, तो मदासुर ने वरदान माँगा – “मुझे किसी देवता, मनुष्य या दानव द्वारा न मारा जा सके।”

वरदान पाते ही उसके सिर पर अहंकार सवार हो गया। उसने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया। देवता परेशान होकर भगवान शिव के पास पहुँचे। शिव ने कहा – “केवल गणेश ही इस संकट को दूर कर सकते हैं।”

भगवान गणेश ने एकदंत का रूप धारण किया। मदासुर से घमासान युद्ध हुआ। एकदंत ने अपनी सूंड और एक दाँत से ऐसा प्रहार किया कि मदासुर का पूरा अहंकार चूर-चूर हो गया। अंत में एकदंत ने उसका वध कर दिया।

इसलिए वैशाख मास की इस चतुर्थी को ‘एकदंत संकष्टी’ कहा जाता है। इस दिन व्रत और पूजा करने से भगवान गणेश हमारे भीतर के ‘मदासुर’ – यानी अहंकार – को भी नष्ट कर देते हैं।

संकष्टी व्रत की शक्ति – इंद्र, विमान और एक अनजाने व्रत की कथा

(यह कथा विशेष रूप से एकदंत अवतार से सीधे नहीं जुड़ी, फिर भी यह पूरे संकष्टी व्रत के चमत्कार को बखूबी दिखाती है।)

गणेश पुराण में एक प्रसंग आता है –

एक बार देवराज इंद्र ऋषि भृंगी से मिलकर वापस अपने विमान से जा रहे थे। रास्ते में उन्हें राजा शूरसेन की नगरी के ऊपर से गुजरना था। उस नगरी में पाप की शक्तियाँ बहुत अधिक एकत्र हो गई थीं – यानी वहाँ का वातावरण बहुत नकारात्मक था। जैसे ही इंद्र का विमान उस क्षेत्र में पहुँचा, विमान की सारी ऊर्जा खत्म हो गई और वह नीचे उतर गया।

राजा शूरसेन घबराकर इंद्र के पास आए। इंद्र ने बताया – “विमान को फिर से उड़ाने के लिए पुण्य चाहिए। कल संकष्टी चतुर्थी थी। अगर इस राज्य में किसी ने व्रत किया हो, तो उसके पुण्य प्रभाव से विमान चल सकता है।”

सैनिकों ने पूरे राज्य में ढूँढ़ा, लेकिन किसी ने जान-बूझकर व्रत नहीं रखा था। तभी गणेश जी के गण एक स्त्री की आत्मा को ले जाते हुए आए। इंद्र ने पूछा – “यह कौन है?”

गणों ने उत्तर दिया – “यह स्त्री बहुत पापी थी, पर कल संकष्टी चतुर्थी के दिन उसने अनजाने में (बिना किसी संकल्प के) दिनभर कुछ नहीं खाया। उसका कोई व्रत का इरादा नहीं था, फिर भी इस कारण उसके सारे पाप धुल गए। अब यह गणेश जी के धाम (स्वानंद लोक) जा रही है।”

जैसे ही वह आत्मा वहाँ से गुज़री, उसके साथ जो पुण्य वातावरण बना, उसने इंद्र के विमान को फिर से उड़ने की शक्ति दे दी।

इस कथा का सीधा सा अर्थ है – संकष्टी चतुर्थी का व्रत इतना पवित्र है कि अनजाने में भी यह अपना असर दिखाता है। यह हमें सिखाता है कि भगवान गणेश सिर्फ हमारे इरादों को नहीं, हमारे कर्मों को देखते हैं। 

एकदंत संकष्टी चतुर्थी के लाभ 

  • जीवन की बाधाओं का समूल नाश
  • मानसिक शांति और घर में सुख-समृद्धि
  • प्राचीन पापों से मुक्ति
  • गणेश जी के धाम (स्वानंद लोक) में स्थान प्राप्ति

यह व्रत केवल संयम नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति का एक माध्यम है।

निष्कर्ष

एकदंत संकष्टी चतुर्थी केवल उपवास का दिन नहीं है – यह भगवान गणेश से संकट मोचन की प्रार्थना का अवसर है। 5 मई 2026, मंगलवार को यदि आप श्रद्धापूर्वक यह व्रत रखें, ऊपर बताई गई विधि और नियमों का पालन करें, तो निस्संदेह गणेश जी की विशेष कृपा आप पर बरसेगी।

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FAQs

एकदंत संकष्टी चतुर्थी 2026 की तारीख और समय क्या है?

एकदंत संकष्टी चतुर्थी 2026 वैशाख मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को मनाई जाएगी। इस दिन का चंद्रोदय समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

एकदंत संकष्टी चतुर्थी का महत्व क्या है?

एकदंत संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश के ‘एकदंत’ स्वरूप को समर्पित है। यह व्रत अहंकार, ईर्ष्या और अभिमान को हराने की शक्ति प्रदान करता है।

इस व्रत का पालन कैसे किया जाता है?

व्रती इस दिन चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का समापन करते हैं। गणेश जी की पूजा में श्रद्धा और भक्ति का विशेष महत्व है।

अंगारकी संकष्टी चतुर्थी क्या है?

यदि संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को पड़े, तो उसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जो विशेष रूप से शुभ मानी जाती है।

गणेश जी को 'एकदंत' क्यों कहा जाता है?

गणेश जी का ‘एकदंत’ नाम उनके एक दांत के कारण है, जो एकाग्रता और संयम का प्रतीक है। यह हमें जीवन में एक लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने की प्रेरणा देता है।