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हाथी घोड़ा पालकी, जय कऩ्हैया लाल की..

हाथी घोड़ा पालकी, जय कऩ्हैया लाल की..

कृष्ण प्रेम के पर्याय हैं। प्यार में ढाई अक्षर होते हैं तथा कृष्ण में भी ढाई अक्षर होते हैं। ६४ कलाओं से युक्त श्री कृष्ण पुरुषोत्तम व सर्वगुण संपन्न हैं। बाल कृष्ण के रूप में बालसुलभ हरकतों से श्री कृष्ण सबका मन मोह लेते हैं ,गोकुल में माखनचोर नटखट नंदकुंवर हैं ,वृंदावन में गोपियों के साथ रास रचाने वाले रसिक कृष्ण हैं, गाय चराते हुये गोपाल के रुप में श्री कृष्ण हैं, अपनी बांसुरी की धुन पूरे जन मानस का मन मोहते सुर के ज्ञाता श्री कृष्ण हैं, राक्षसों का वध करने वाले योद्धा के रुप में श्री कृष्ण हैं तो कुरुक्षेत्र में गीता का ज्ञान देते हुए धर्म की स्थापना करने वाले श्री कृष्ण हैं। धरती के कण-कण में श्री कृष्ण बसे हुए हैं। माता देवकी और पिता वासुदेव की आठवीं संतान श्री कृष्ण के जन्म के पुर्व ही आकाशवाणी हो गयी थी कि उन के हाथों उन के मामा कंस का वध होगा। अधर्म को समाप्त करने और धर्म की स्थापना हेतु ही श्री कृष्ण का जन्म हुआ। इसलिए भगवत गीता में कहा गया है-

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानि: भवति भारत।
अभ्य्त्थानम अधर्मस्य तदा आत्मानं सृजामि अहम।।
परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्क्रुताम।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।

अर्थात, जैसे-जैसे धर्म की हानि होगी और अधर्म फ़ैलता जायेगा तब-तब धर्म की रक्षा हेतु, सज्जनो की रक्षा हेतु और दुष्टो के विनाश हेतु प्रत्येक युग में मैं अवतरित हूंगा।आकाशाम पतितं तोयं यथा गच्छति सागरं सर्व देव नमस्कारम केशवं प्रति गच्छति।

अर्थात जैसे आकाश से गिर कर पानी सागर में मिल जाता है वैसे ही किसी भी भगवान को किया हुआ नमस्कार केशव जी को ही जाता है। केशव, मुरलीधर, मनोहर, नंदलाल, रणछोड़, जगन्नाथ, द्वारकाधीश जैसे १००० नामों से पुकार कर भक्त विष्णु सहस्त्र पाठ के रूप में उन की आराधना करतें हैं। श्री कृष्ण के अवतार में भगवान ने बहुत सी लीलाएं की हैं और इसीलिए इस अवतार को पूर्ण पुरुषोत्तम अवतार भी कहा जाता है और हर तरह से वें पूर्ण अवतार ही हैं। उन के जीवन में कोई भी ऐसी घटना नही थी जो अकारण घटी। श्री कृष्ण ने हर एक को उस के कर्म के आधार पर योग्य न्याय दिया है। आर्थिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, नैतिक या किसी भी और तरीके से देखें तो पता चलता है कि श्री कृष्ण जैसे समाज सुधारक और कोई नही जन्मे। उन की बराबरी में खडा रह सके ऐसा कोई राजनीतिज्ञ इस संसार में नही है। श्री कृष्ण ने गीता में कहा है-

  • तुम बिना मतलब की चिंता मत करो क्योंकि आत्मा का ना तो जन्म हता है और ना ही उस की मृत्यु।
  • जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है वह भी अच्छा हो रहा है और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा।
  • तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया प्रभु से लिया। जो दिया, इसी को दिया। खाली हाथ आए और खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।
  • परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम गरीब हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।
  • ना यह शरीर तुम्हारा है, ना तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा। परन्तु आत्मा स्थिर है, फिर तुम क्या हो? तुम अपने आप को भगवान के अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इस के सहारे को जानता है वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है।
  • जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान के अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्त का आनंद अनुभव करेगा।

जब जब इस धरती पर असूरों का अत्याचार बढा है और धर्म का पतन हुआ है, तब तब भगवानने इस धरती पर अवतार लेकर धर्म और सत्य की स्थापना की है। हिंदु संस्कृति के अनुसार श्रावण वद अष्टमी के दिन भगवान श्री कृष्ण का जन्म संपूर्ण भारत में ही नही बल्कि पूरे विश्व में बसे हिंदुओं द्वारा बडी धूमधाम से मनाया जाता है। भगवान स्वयं इस दिन धरती पर आए थें और इसलिए इस दिन को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन स्त्री और पुरुष दोनो ही रात के १२ बजे तक व्रत रखतें हैं। इस दिन मंदिर में झूले को सजाया जाता है और भगवान श्री कृष्ण को उस झूले में झुलाया जाता है। मथुरा के राजा कंस ने अपनी बहन देवकी का विवाह उन के मित्र वासुदेव के साथ कराने के बाद हुई आकाशवाणी के कारण उन दोनों को कारागार में डाल दिया और अनंत यातनाएं दीं। उन के आठ वे संतान के हाथों अपने वध से बचने के लिए कंस ने उन के पहले सात संतानों को भी बडी निर्दयता से मार डाला। इसलिए कंस के अधर्म, पाप और दुराचार का अंत करने के लिए श्रावण वद अष्टमी की मध्यरात्री को कारागार में श्री कृष्ण का जन्म हुआ। इसी के साथ धरती पर दिव्यता प्रकट हुई और वासुदेव के पैरों में बंधी बेडियां टूट गयी। तूफ़ानी रात में मूसलाधार बरसात में और बाढग्रस्त यमुना से गुज़र कर वासुदेव गोकुल पहुंचे और अपने परम मित्र नंदलाल और उन की दर्मपत्नि यशोदा के हाथ में अपने पुत्र श्री कृष्ण की ज़िम्मेदारी सौंप कर फ़िर कारागार में लौट गए। बस यहीं से कंस रूपी अधर्म के अंत की शुरुआत हुई और भगवान श्री कृष्ण ने अपने जीवनचरित्र द्वारा दुनिया को सत्य का मार्ग दिखाया।

जन्माष्टमी के दिन पूजा और व्रत कैसे करें?

  • सुबह सूर्योदय से व्रत शुरु करना है और वह पूरा होगा अगले दिन के सूर्योदय पर। इस दौरान हर नीति-नियम का पालन करना है।
  • स्नान इ. नित्यकर्म पूरे कर के ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जितनी बार हो सके उतनी बार जाप करना है।
  • श्री कृष्ण की मूर्ति हो तो उसे सजा कर रात के १२ बजे अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार नंदोत्सव मना सकतें हैं और पंजरी और माखन का प्रसाद बना सकतें हैं।
  • दूसरे दिन बाल गोपाल को ५२ भोग अथवा बाज़ार में उपलब्ध मिठाईयों का भोग चढाएं और उस के बाद आप व्रत तोड सकतें हैं।

गणेशा की कृपा से,
श्री धर्मेश जोशी
गणेशास्पिक्स टीम

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