माता बगलामुखी को पीला वस्त्र चढ़ाने से होता है सभी दुखों का नाश
दस महाविद्या में आठवीं मां बगलामुखी की जयंती वर्ष 2026 में 24 अप्रैल को मनाई जाएगी। वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को देवी बगलामुखी का अवतरण दिवस है। इस दिन व्रत एवं पूजा की जाती है। इस अवसर पर देश भर में जगह-जगह अनुष्ठान के साथ ही महायज्ञ का आयोजन भी किया जाता है। बगला शब्द संस्कृत भाषा के शब्द वल्गा से निकला है, जिसका अर्थ दुल्हन होता है। मां के अलौकिक सौंदर्य और स्तंभन शक्ति के कारण ही इन्हें यह नाम मिला है।
बगलामुखी जयंती 2026 की तारीख और समय
यह वैशाख मास के अष्टमी तिथि (चंद्र मास के 8वें दिन) को मनाई जाती है।
इस वर्ष यह 24 अप्रैल (शुक्रवार) को होगी।
अष्टमी तिथि प्रारंभ – 23 अप्रैल, 2026 को शाम 06:19 बजे
अष्टमी तिथि समाप्त – 24 अप्रैल, 2026 को शाम 04:51 बजे
भक्तों की सारी परेशानियों को दूर करने वाली देवी हैं माता बगलामुखी
माता बगलामुखी को स्तंभन शक्ति की अधिष्ठात्री कहा जाता है। वे भक्तों की सारी परेशानियों को दूर करने वाली हैं। यही कारण है कि इस दिन लोग शत्रुनाशिनी बगलामुखी देवी का विशेष पूजन और जागरण भी करते हैं। इनका एक नाम पीताम्बरा भी है, इसलिए इनकी पूजा में पीले रंग की सामग्री का उपयोग ज्यादा होता है। साधक को भी माता बगलामुखी की आराधना करते वक्त पीले रंग का वस्त्र ही धारण करना चाहिए। देवी रत्नजडित सिंहासन पर विराजती हैं और रत्नमय रथ पर आरूढ़ होकर शत्रुओं का नाश करती हैं। देवी के भक्तों को हर क्षेत्र में सफलता मिलती है। पीले फूल और नारियल चढाने से देवी प्रसन्न होती हैं। बगलामुखी देवी को पीली हल्दी के ढेर पर दीप-दान करने और मूर्ति पर पीला वस्त्र चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है।
बगलामुखी माता की पौराणिक कथा
माता बगलामुखी से जुड़ी पौराणिक कथा के मुताबिक एक बार सतयुग में उत्पन्न ब्रह्मांडीय तूफान के कारण संपूर्ण विश्व पर खतरा मंडराने लगा। जिससे लोग संकट में पड़ गए और चारों ओर हाहाकार मच गया। तूफान से हो रहे विनाश को देख भगवान विष्णु चिंतित हो गए। कोई उपाय न देख उन्होंने भगवान शिव का स्मरण किया। इसके बाद भगवान शंकर ने उनसे कहा कि इस विनाश को शक्ति के अलावा कोई नहीं सकता। इसके बाद भगवान विष्णु ने हरिद्रा सरोवर के निकट पहुंच कर कठोर तपस्या कर महात्रिपुरसुंदरी को प्रसन्न किया। इसके बाद सौराष्ट्र क्षेत्र की हरिद्रा झील में जलक्रीडा करती महापीत देवी के हृदय से दिव्य तेज उत्पन्न हुआ। उस वक्त रात्रि देवी बगलामुखी के रूप में प्रकट हुई और उन्हेंने भगवान विष्णु को इच्छित वर दिया, तब सृष्टि का विनाश रूक सका। देवी सिद्ध विद्या हैं, इसलिए तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं, जबकि गृहस्थों के लिए देवी हर तरह के मुश्किलों का शमन करने वाली हैं।
मां बगलामुखी पूजन विधि
– प्रात: काल उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर, पीले वस्त्र धारण करने चाहिए।- चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवती बगलामुखी का चित्र स्थापित करें.- साधना अकेले में, मंदिर में या किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर की जानी चाहिए।- पूजा पूर्व दिशा की ओर मुख करके करनी चाहिए।- इस पूजा में ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक होता है।- मंत्र- सिद्धि के लिए होने वाली पूजा में चने की दाल से माँ बगलामुखी का पूजन यंत्र बनाया जाता है। संभव हो तो ताम्रपत्र या चांदी के पत्र पर इसे अंकित करना चाहिए।
बगलामुखी मंत्र
ऊँ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्ववां कीलय बुद्धि विनाशय ह्रीं ओम स्वाहा।
गणेशजी के आशीर्वाद सहित
आपका मार्गदर्शक
गणेशास्पीक्स डाॅट काॅम
FAQs
माता बगलामुखी की जयंती कब मनाई जाती है?
माता बगलामुखी की जयंती वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह 24 अप्रैल को है।
माता बगलामुखी की पूजा में कौन से वस्त्र धारण करने चाहिए?
माता बगलामुखी की पूजा में पीले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए।
माता बगलामुखी की पूजा के लिए कौन-कौन सी सामग्री का उपयोग होता है?
माता बगलामुखी की पूजा में पीले फूल, नारियल, और पीली हल्दी का उपयोग होता है।
माता बगलामुखी की पूजा कैसे की जाती है?
माता बगलामुखी की पूजा पूर्व दिशा की ओर मुख करके की जाती है। पूजा में ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है और चने की दाल से पूजन यंत्र बनाया जाता है।
माता बगलामुखी की पौराणिक कथा क्या है?
माता बगलामुखी की पौराणिक कथा के अनुसार, सतयुग में एक ब्रह्मांडीय तूफान के कारण संपूर्ण विश्व पर संकट मंडराने लगा। भगवान विष्णु ने कठोर तपस्या कर देवी बगलामुखी को प्रसन्न किया, जिन्होंने तूफान को रोककर सृष्टि का विनाश रोका।
