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गीता जयंती विशेष : गीता के इन श्लोक को समझकर बनाएं जीवन सफल

गीता जयंती विशेष

प्रबंधकीय कौशल का ज्ञान है गीता के श्लोकों में

18 दिसंबर 2018 को गीता जयंती का त्यौहार है। इस दिन गीता पूजन के साथ ही कई धार्मिक कार्यक्रम भी अायोजित किए जाते हैं। महाभारत के युद्ध के वक्त श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया था, जिसे गीता में समाहित किया गया है। उस वक्त श्रीकृष्ण का गीतोपदेश वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी समसामयिक है। गीता के इन श्लोक और उपदेशों में जीवन का सार है, जिससे हमें भोजन, स्वस्थ शरीर, अनुशासन और नजरिये की जानकारी मिलती है। यही नहीं इनसे प्रतिस्पर्धा के दौर में सफलता और प्रबंधकीय कौशल की भी जानकारी मिलती है। यहां हम गीता के 18 अध्यायों में समाहित करीब 720 श्लोकों में से कुछ प्रमुख श्लोक और उनके अर्थ के जरिए जानेंगे कि उनका हमारे जीवन से कितना जुड़ाव है और उनका कितना महत्व है।

गीता के श्लोक और उनका सार

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नत:।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।।
श्रीमद् भागवद् गीता के छठे अध्याय के 16वें श्लोक के जरिए श्रीकृष्ण ने भोजन और स्वास्थ्य के बारे में कहा है। इसके मुताबिक बहुत ज्यादा खाने वाले लोग कभी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाते हैं। इसी तरह बहुत कम खाने वाले भी अपना काम नहीं पूरा कर पाते, जिससे उन्हें सफलता नहीं मिलती है। तात्पर्य यह है कि अधिक खाने पर हमारा पाचन तंत्र बिगड़ सकता है और अपच, कब्ज, एसीडिटी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसी प्रकार बहुत कम खाने वालों को भी शारीरिक समस्याएं होती हैं। अधिक भोजन से आलस्य और मोटापा बढ़ता है तो कम भोजन से शरीर कमजोर होता है।

नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत॥
गीता के दूसरे अध्याय के 23वें श्लोक के जरिए श्रीकृष्ण ने अात्मा के शाश्वत होने की बात कही है। श्लोक का अर्थ यह है कि आत्मा को न तो शस्त्र काट सकते हैं, न ही आग जला सकती है, न पानी उसे भिगो सकता है और न हवा उसे सुखा सकती है।

हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम्, जित्वा वा भोक्ष्यसे महिम्।
तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:॥
दूसरे अध्याय के ही 37वें श्लोक के जरिए वर्तमान कर्म का परिणाम और महत्व बताया गया है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि यदि तुम युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि विजयी होते हो तो धरती का सुख भोगोगे। इसलिए उठो हे कौन्तेय और निश्चय कर युद्ध करो।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
चौथे अध्याय के 7वें श्लोक श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेने की बात कही है। उन्होंने कहा है कि जब-जब धर्म की हानी होती है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं धर्म के अभ्युत्थान के लिए अवतार लेता हूं।

परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे॥
चौथे अध्याय के 8वें श्लोक के जरिए श्रीकृष्ण ने कहा है कि सज्जन पुरुषों के कल्याण, दुष्कर्मियों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं प्रत्येक युग में जन्म लेता आया हूं।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणी॥
दूसरे अध्याय के 47वां श्लोक कर्मयोग दर्शन का मूल अाधार है। श्लोक के मुताबिक कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, लेकिन कर्म के फलों में कभी नहीं। इसलिए फल प्राप्त के लिए कर्म न करो और न ही काम करने में तुम्हारी आसक्ति हो।

पढ़िए गीता जयंती का महत्व और अनुष्ठान और इसका रहस्य

गीता के इन श्लोकों से मिलते हैं प्रबंधकीय कौशल के टिप्स

योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय।
सिद्धय-सिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।
श्री कृष्ण कहते हैं, हे धनंजय (अर्जुन), कर्म न करने का आग्रह त्यागकर, यश-अपयश के विषय में समबुद्धि होकर, योग युक्त होकर कर्म कर, क्योंकि समत्व को ही योग कहते हैं। मतलब कर्तव्य ही धर्म है और लाभ हानी का विचार किए बिना अपना कर्म करना चाहिए।

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयत: शांतिरशांतस्य कुत: सुखम्।
योग रहित पुरुष में न निश्चय करने की बुद्धि और न ही मन में भावना ही होती है। भावना रहित पुरुष को शांति नहीं मिलती और जिसे शांति नहीं, उसे सुख कहां से मिलेगा। सुख की प्राप्ति के लिए मन और इंद्रियों पर नियंत्रण जरुरी है।

विहाय कामान् य: कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह:।
निर्ममो निरहंकार स शांतिमधिगच्छति।।
जो मनुष्य सभी इच्छाओं व कामनाओं को त्याग कर ममता और अहंकार रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है, उसे ही शांति प्राप्त होती है।

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।।
कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार उनसे कर्म करवाकर उसके परिणाम देती है।

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मण:।।
श्रीकृष्ण कहते हैं, तू शास्त्रों में बताए गए अपने धर्म के अनुसार कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से शरीर का पालन-पोषण भी नहीं होगा।

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्म संगिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन्।।
ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे, बल्कि स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित हो सब कर्मों को अच्छी प्रकार करते हुए उनसे भी वैसे ही कराए। अर्थात अपने कर्म से दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बनने वाला व्यक्ति ही श्रेष्ठ होता है और उसे सफलता मिलती है।

गणेशजी के आशीर्वाद सहित,
गणेशास्पीक्स डाॅट काॅम

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