नवरात्रि के नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों, यानी नवदुर्गा, की पूजा की जाती है। ये हैं माँ शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। 2026 में शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू हो रही है। हर स्वरूप शक्ति के एक अलग पहलू, जैसे तपस्या, साहस, सृजन, मातृत्व, पवित्रता और सिद्धि, का प्रतीक है।
नवरात्रि नौ दिनों का एक पावन पर्व है; जिसका प्रत्येक दिन एक विशेष उद्देश्य को समर्पित होता है और इस दिन माँ दुर्गा के एक भिन्न अवतार की पूजा की जाती है। भगवती के इन नौ अवतारों को ‘नवदुर्गा’ के नाम से जाना जाता है, और मान्यता है कि ये सभी स्वरूप माँ दुर्गा के अलग-अलग पहलुओं और शक्तियों को दर्शाते हैं।
नवरात्रि के ये 9 दिन सृष्टि की रचना, ज्ञान, मातृत्व, शुद्धि और परम ज्ञान (आध्यात्मिक जागृति) जैसे विभिन्न जीवन मूल्यों को अपने भीतर समेटे हुए हैं, जिसकी शुरुआत माँ शैलपुत्री से होकर समापन माँ सिद्धिदात्री पर होता है। इन 9 देवियों की उपासना करने से नवरात्रि के इस पावन पर्व का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।
शारदीय नवरात्रि 2026 कैलेंडर: तारीख, देवी और रंग
| दिन | तारीख | तिथि | देवी | रंग |
|---|---|---|---|---|
| पहला दिन | रविवार, 11 अक्टूबर 2026 | प्रतिपदा (घटस्थापना) | मां शैलपुत्री | नारंगी |
| दूसरा दिन | सोमवार, 12 अक्टूबर 2026 | द्वितीया | मां ब्रह्मचारिणी | सफेद |
| तीसरा दिन | मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 | तृतीया | मां चंद्रघंटा | लाल |
| चौथा दिन | बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 | चतुर्थी | मां कुष्मांडा | रॉयल ब्लू |
| पांचवां दिन | गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 | पंचमी | मां स्कंदमाता | पीला |
| छठा दिन | शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026 | षष्ठी | मां कात्यायनी | हरा |
| सातवां दिन | शनिवार, 17 अक्टूबर 2026 | सप्तमी (महासप्तमी) | मां कालरात्रि | स्लेटी (ग्रे) |
| – | रविवार, 18 अक्टूबर 2026 | सप्तमी जारी; अष्टमी सुबह 08:29 से प्रारम्भ | – | – |
| आठवां दिन | सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 | अष्टमी (दुर्गाष्टमी) | मां महागौरी | बैंगनी |
| नौवां दिन | मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 | नवमी (महानवमी) | मां सिद्धिदात्री | मोरपंखी हरा |
| दशहरा | मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 | दशमी दोपहर 12:51 से प्रारम्भ | विजयादशमी | – |
पहला दिन – माँ शैलपुत्री: हिमालय की पुत्री
नवरात्रि का पहला दिन माँ दुर्गा के प्रथम स्वरूप ‘माँ शैलपुत्री‘ के पूजन के लिए समर्पित है। इनके नाम का अर्थ है ‘पर्वत की पुत्री’, क्योंकि इनका जन्म पर्वतराज हिमालय (शैल) के घर हुआ था।
माँ शैलपुत्री को देवी पार्वती के नाम से भी जाना जाता है। इनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया था। नवरात्रि के प्रारंभ में इनकी पूजा करना आपकी नौ दिवसीय आध्यात्मिक यात्रा का पहला कदम है, जो शक्ति की भक्ति के लिए एक मजबूत नींव तैयार करता है।
दूसरा दिन – माँ ब्रह्मचारिणी: तपश्चर्या की देवी
दूसरा दिन माँ ब्रह्मचारिणी की साधना का होता है। भगवती का यह स्वरूप उस समय का प्रतीक है जब देवी दुर्गा ने भगवान शिव को पति रूप में पाने की तीव्र इच्छा के साथ कठिन और घोर तपस्या की थी।
माँ की यह अगाध भक्ति हमें सिखाती है कि चाहे राह कितनी भी कठिन क्यों न हो, थोड़ा सा धैर्य, अनुशासन और दृढ़ संकल्प आपको आपकी मंज़िल तक पहुँचा सकता है। मान्यता है कि माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना करने से साधक को तन-मन की पवित्रता के साथ-साथ सुख-शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
तीसरा दिन – माँ चंद्रघंटा: जगज्जननी योद्धा देवी
नवरात्रि का तीसरा दिन माँ चंद्रघंटा को समर्पित है। देवी के इस स्वरूप की दस भुजाएँ हैं, जिनमें से आठ भुजाओं में वे अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं। वे ‘धर्म’ रूपी सिंह (शेर) पर सवार होती हैं। माँ चंद्रघंटा का यह उग्र और भयंकर रूप अपने भक्तों की रक्षा का प्रतीक है। सच्चे मन से इनकी पूजा करने से व्यक्ति पापों, कष्टों और मानसिक संताप से मुक्त हो जाता है।
माँ का यह स्वरूप यह दर्शाता है कि दिव्य शक्ति जहाँ एक ओर अत्यंत कोमल और करुणामयी है, वहीं दूसरी ओर विपत्तियों का सामना करने के लिए उतनी ही दृढ़ और शक्तिशाली भी है।
चौथा दिन – माँ कूष्मांडा: ब्रह्मांड की आद्यसृष्टि
चौथे दिन हम माँ कूष्मांडा की पूजा करते हैं। देवी के इस स्वरूप का संबंध मुख्य रूप से सृष्टि की रचना से है।
माना जाता है कि इनका नाम एक ब्रह्मांडीय अण्ड (अंडे) के रूप में इस पूरे संसार की रचना से जुड़ा है। ऐसी मान्यता है कि वे सूर्यलोक के केंद्र में निवास करती हैं और अपने तेजोमय प्रकाश व सृजनात्मक ऊर्जा से संपूर्ण दिशाओं को आलोकित करती हैं।
माँ कूष्मांडा को अष्टभुजाधारी (आठ हाथों वाली) रूप में दर्शाया जाता है, जिनके एक हाथ में जपमाला होती है। कहा जाता है कि यह जपमाला साधक को सिद्धियाँ और अष्ट-सिद्धियाँ प्रदान करती है।
पांचवां दिन – माँ स्कंदमाता: भगवान स्कंद की माता
पांचवां दिन भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता ‘माँ स्कंदमाता‘ को समर्पित है।
पारंपरिक रूप से इन्हें सिंह पर सवार और अपनी गोद में अपने पुत्र कार्तिकेय को बैठाए हुए दर्शाया जाता है। इनका यह स्वरूप प्रकृति माँ का वह रूप है जो इस ब्रह्मांड की हर दिव्य वस्तु और जीव का पालन-पोषण व संरक्षण करता है।
कहा जाता है कि माँ स्कंदमाता की उपासना करने से भक्त का हृदय पूरी तरह विशुद्ध और निर्मल हो जाता है। इनकी पूजा से जुड़ा एक और बेहद दिलचस्प पहलू यह है कि माँ स्कंदमाता की प्रार्थना करने से भगवान कार्तिकेय की पूजा स्वयं हो जाती है, जिससे भक्त को माता और पुत्र दोनों की संयुक्त कृपा प्राप्त होती है।
छठा दिन – माँ कात्यायनी: महिषासुरमर्दिनी
माँ कात्यायनी देवी भगवती का एक अत्यंत तेजस्वी और उग्र स्वरूप हैं।
इनका यह अवतार एक महान और पवित्र उद्देश्य के लिए हुआ था – दुष्ट दानव महिषासुर का वध करने के लिए। परिणामस्वरूप, इनकी कथा आसुरी शक्तियों पर दैवीय शक्ति की विजय का अमर प्रतीक है।
यद्यपि वे अपने योद्धा रूप में एक उग्र देवी हैं, फिर भी सनातन परंपरा में माँ कात्यायनी अपने सच्चे भक्तों के प्रति अत्यंत करुणामयी और वत्सल हैं। निष्कपट भक्ति से उन्हें प्रसन्न करना बहुत सहज है। माना जाता है कि उनकी कृपा से जीवन में अपार सुख-समृद्धि आती है।
सातवां दिन – माँ कालरात्रि: दुर्गा का उग्र स्वरूप
नवरात्रि की सप्तमी तिथि माँ कालरात्रि के पूजन के लिए निर्धारित है – जो माँ दुर्गा के सबसे भयानक, उग्र और शक्तिशाली स्वरूपों में से एक हैं।
इनका वर्ण (रंग) घनघोर अंधकार की भांति काला है, ये गर्दभ (गधे) की सवारी करती हैं; इनकी चार भुजाएँ, तीन नेत्र और मुख से अग्नि की ज्वालाएँ निकलती हैं। यद्यपि इनका रूप अत्यंत भय उत्पन्न करने वाला है, लेकिन इनके इस विकराल आकार का तात्पर्य अपने भक्तों को भयभीत करना कतई नहीं है।
देवी माँ कालरात्रि की पूजा निर्भयता प्रदान करने वाली और समस्त कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली मानी गई है। कहा जाता है कि वे अपने भक्तों के मार्ग में आने वाली हर बाधा को दूर करती हैं और उनके जीवन में शांति व समृद्धि लाती हैं।
आठवां दिन – माँ महागौरी: पवित्रता और शांति की प्रतीक
नवरात्रि के आठवें दिन (महाअष्टमी) माँ महागौरी की पूजा की जाती है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, निरंतर और कठिन तपस्या करने के कारण देवी का वर्ण श्याम (काला) हो गया था। भगवान शिव उनकी इस अनन्य तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने गंगाजल से उन्हें स्नान कराया। इसके प्रभाव से देवी का शरीर अत्यंत कांतिमान, गौरवर्ण और देदीप्यमान हो गया, जिसके बाद उनका नाम ‘महागौरी’ पड़ा।
श्रद्धालु सामान्यतः मन की शांति, सद्बुद्धि और कष्टों से निवृत्ति पाने के लिए देवी महागौरी की शरण में जाते हैं और उनका पूजन करते हैं।
नौवां दिन – माँ सिद्धिदात्री: सिद्धियों की दात्री
नवरात्रि की नवमी तिथि माँ सिद्धिदात्री को समर्पित है। इनका नाम ही आध्यात्मिक जगत में इनकी अपरंपार शक्ति को दर्शाता है: ‘सिद्धि’ का अर्थ है अलौकिक शक्तियाँ या आध्यात्मिक उपलब्धियाँ, और ‘दात्री’ का अर्थ है देने वाली।
चित्रों व मूर्तियों में आप इन्हें चतुर्भुज रूप में गदा, शंख, चक्र और कमल पुष्प धारण किए हुए देखते हैं, जहाँ देवी-देवता और गंधर्व इनकी स्तुति करते हैं।
इनकी पूजा-अर्चना नवदुर्गा की नौ दिवसीय यात्रा का चरमोत्कर्ष (समापन) है। माना जाता है कि माँ सिद्धिदात्री की सच्चे हृदय से भक्ति करने से साधक को संसार के भौतिक बंधनों से मुक्ति मिल जाती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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नवदुर्गा पूजा का गहरा आध्यात्मिक अर्थ
माँ दुर्गा के इन नौ स्वरूपों की पूजा केवल एक के बाद एक अलग-अलग दिनों में की जाने वाली रस्म भर नहीं है। ये एक ही परम दिव्य शक्ति (आदिशक्ति) के विविध रूपों को प्रदर्शित करते हैं।
नवदुर्गा की उपासना हमें यह भी सिखाती है कि यह परम दैवीय ऊर्जा किसी एक निश्चित सीमा या रूप में बंधी नहीं है। जब भी आवश्यकता होती है, माँ दुर्गा कोई न कोई स्वरूप धारण कर लेती हैं—चाहे वह एक करुणामयी माँ का हो, एक पराक्रमी योद्धा का हो या एक एकाग्र तपस्विनी का। नौ दिनों तक इनके नौ स्वरूपों का पूजन करके भक्तों को शक्ति को केवल एक गुण के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के हर पहलू को संभालने वाली एक जीवंत उपस्थिति के रूप में अनुभव करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।
FAQs
नवरात्रि 2026 में किस दिन से शुरू हो रही है?
नवरात्रि 2026 में 11 अक्टूबर से शुरू हो रही है।
नवरात्रि के पहले दिन किस देवी की पूजा की जाती है?
नवरात्रि के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है।
माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा का क्या महत्व है?
माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा से तन-मन की पवित्रता, सुख-शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
माँ चंद्रघंटा का स्वरूप क्या दर्शाता है?
माँ चंद्रघंटा का स्वरूप भक्तों की रक्षा का प्रतीक है और यह दर्शाता है कि दिव्य शक्ति करुणामयी और शक्तिशाली दोनों होती है।
माँ कूष्मांडा का संबंध किससे है?
माँ कूष्मांडा का संबंध सृष्टि की रचना से है और वे सूर्यलोक के केंद्र में निवास करती हैं।
