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रूद्राभिषेक की महिमा – स्वयं शिव शंकर हर लेते है सभी दुख

सनातन धर्म के आधार स्तंभों में से एक वेदों में हमें रूद्राष्टाध्यायी का उल्लेख मिलता है। रूद्राष्टाध्यायी यजुर्वेद का अंग है। रूद्राष्टाध्यायी में ही रूद्राभिषेक और उससे जुड़े विधि-विधानों का उल्लेख मिलता है। रूद्राभिषेक जैसा की नाम से ही स्पष्ट होता है, रूद्र धन अभिषेक अर्थात रूद्र का अभिषेक। रूद्र शिव का महारूप है, और अभिषेक अर्थात विधि विधान से स्नान करना या करवाना होता है। वेदों के अतिरिक्त भी हमें अन्य कई धर्म ग्रंथों में रूद्राभिषेक और उससे मिलने वाले फलों का उल्लेख मिलता है। मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव शंकर को भगवानों में सबसे सरल और आसान स्वभाव का धनी माना गया है। ठीक उसी प्रकार उनकी पूजा विधि भी सरल और आसान होती है। अर्थात भगवान शिव को प्रसन्न कर उनसे अपनी मनोकामना सिद्धि का वरदान प्राप्त करना भी आसान होता है। वेदांशों के अनुसार सिर्फ भगवान शिव के वंदन और पूजन से प्राणी को समस्त देवों के पूजन का फल प्राप्त हो सकता है। रुद्रहृदयोपनिषद् के अनुसार……

सर्वदेवात्मको रुद्ररू सर्वे देवाः शिवात्मकाः।
रुद्रात्प्रवर्तते बीजं बीजयोनिर्जनार्दनः।।
यो रुद्रः स स्वयं ब्रह्मा यो ब्रह्मा स हुताशनः।
ब्रह्मविष्णुमयो रुद्र अग्नीषोमात्मकं जगत्।।

अर्थात रूद्र ही ब्रह्रा, विष्णु है और सभी देवता रूद्र अर्थात शिव का ही अंश है। सब कुछ रूद्र से ही जन्मा है। कम शब्दों में कहा जाये तो सभी देवताओं की आत्मा रूद्र का ही अंश है और रूद्र ही स्वयंभू है। सनातन धर्म ऋषियों ने वेदों और उपनिषदों से प्राप्त ज्ञान का उपयोग मानव जगत के उत्थान और उनके दुखों को हरने के लिए किया है। इसी क्रम में उन्होंने रूद्राभिषेक का उपाय भी लोगों तक पहुंचाया ताकि मनुष्य को प्रथ्वी लोक के दुखों से मुक्ति मिल सके और वह परमात्मा परमेश्वर के चरणों में जा आनंद प्राप्त कर सके।


रूद्राभिषेक भगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे सरल और आसान उपाय है। रूद्राभिषेक के माध्यम से हम अपने जीवन के विभिन्न दुखों को दूर कर सकते है। चाहे वह हमारे रोजमर्रा के जीवन से जुडे हो या मन में छुपी कोई गहरी मनोकामना। शिवलिंग की विधिवत पूजा ही रूद्राभिषेक है। वैदिक ज्योतिष में भी रूद्राभिषेक का उल्लेख मिलता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार रूद्राभिषेक के माध्यम से जातक राहु, शनि की दशा, अशुभ ग्रह गोचर, मंगल दोष, विष दोष, केमद्रुम दोष, नाडी दोष, सर्प दोष जैसी अनेक पीडाओं से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। दुखः दोषों के निवारण के साथ ही रूद्राभिषेक के माध्यम से मनुष्य अपने मनोरथ भी सिद्धि कर सकता है। रूद्राभिषेक से अखंड धन लाभ, मानसिक सुख-शांति, कार्य उन्नति, संतान प्राप्ति, लंबी आयु, रोगों का नाश, लक्ष्मी सिद्धि और आकर्षक व्यक्तित्व की प्राप्ति की जा सकती है।

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धर्मग्रथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दुःखों का मूल कारण है। और पाप का मूल कारण है हमारा चित्त, चूंकि विषयभोग या काम इच्छा के लिए हमारे मन में लगातार तीव्र इच्छाएं उठती रहती है। इन्ही तीव्र इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए हम मन और तन से पाप के भागी बनने लगते है। लेकिन रूद्रा की आराधना या अभिषेक के माध्यम से हम अपने चित्त और मन को काबू कर सकते है। रूद्राभिषेक मनुष्य को जीवन की अराजकता को छोड़ पुरूषोत्तम बनने की राह दिखाता है। मनुष्य जहां अपने दुख को दूर करने या मनोरथ सिद्ध करने के लिए रूद्राभिषेक कर सकता है। वहीं निष्काम भाव से भी रूद्राभिषेक किया जा सकता है। जहां स्वार्थ सिद्धि के लिए किये गये रूद्राभिषेक से जुड़े कई नियम है, वहीं निष्काम भाव से किए जाने वाले रूद्राभिषेक के लिए किसी तरह के कड़े नियम का पालन नहीं करना पड़ता है। अभी रूद्राभिषेक के लिए बुकिंग कर पाये अपने दुख दोषों से छुटकारा……. गौरतलब है कि, रूद्र बेहद शांत और आसान स्वभाव के धनी है इसलिए वे अपनी आराधना या पूजन के दौरान होने वाली गलतियों पर ध्यान ना देकर केवल साधक की आकांशा और मन की पवित्रता के आधार पर उसे फल प्रदान करते है। भगवान शंकर अपने भक्तों के पवित्र भाव से प्रसन्न होने वाले भगवान है, इसलिए यदि जातक अपने किसी परिजन, मित्र या सगे संबंधी के लिए भी इस अभिषेक को पवित्र मन से करता या सिद्ध पंडितों से करवाता है तो उक्त जातक को इसका फल प्राप्त हो सकता है।

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रूद्राष्टाध्यायी के अनुसार रूद्राभिषेक के दौरान शिवलिंग का विधिवत मंत्रोच्चारण के साथ पूजन करना चाहिए। इस दौरान आप अभिषेक के लिए दुग्ध, जल, गन्ने का रस, शक्कर मिश्रित जल आदि का उपयोग कर सकते है। वैसे दूध अथवा जल से रूद्र का अभिषेक उत्तम माना गया है। भगवान शिव के अभिषेक से पहले गणेश जी की आज्ञा प्राप्त करें और अन्य देवी देवताओं और नवग्रह को विराजित करने के बाद अभिषेक की शुरूआत करें। अभिषेक के दौरान रूद्री पाठ का निम्न क्रमानुसार उच्चारण करते रहें।

(1) शुक्ल यजुर्वेदीय रूद्राष्टाध्यायी का पाठ (1 या 11 बार)
(2) शुक्ल यजुर्वेदीय रूद्राष्टाध्यायी का पंचम और अष्टम अध्याय का पाठ
(3) कृष्णा यजुर्वेदीय पाठ का ”नमक” पाठ 11 बार, हर पाठ के बाद ”चमक” पाठ के एक श्लोक का पाठ (एकादश रूद्र पाठ)
(4) शिव सहस्त्रनाम पाठ
(5) रूद्र सुक्त का पाठ

सनातन धर्म में किसी भी धार्मिक कार्य के लिए मुहूर्त चुनाव को विशेष महत्व प्राप्त है। इसीलिए रूद्राभिषेक के लिए भी तिथियों का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। रूद्राभिषेक के लिए शिव जी की उपस्थिति देखना बहुत जरूरी है। शिव के निवास को देखे बिना कभी भी रूद्राभिषेक से मनचाहे फल की प्राप्त नहीं किये जा सकते।

गणेशजी के आशीर्वाद सहित,
गणेशास्पीक्स डाॅट काॅम


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A Chemist and Jyotish Parasharam from London, he is a global grandmaster. Author of 19 stock market books, with a massive legacy of analyzing 275,000+ horoscopes and 2,500+ media shows, he is the ultimate, most trusted solver for Vastu, Tarot, Numerology, Pranic Healing, Tantra-Mantra, and Yantra-Gem-Rudraksha therapies.

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