पौष पूर्णिमा, जिसे शाकंभरी पूर्णिमा भी कहा जाता है, पौष माह की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। व्रत रखने के लिए यह दिन सबसे पवित्र दिनों में से एक माना जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, शुभ दिन पर व्रत रखना एक सम्मान है और आध्यात्मिक उपवास का एक श्रेष्ठ तरीका भी।
पौष पूर्णिमा व्रत का महत्व
पौष पूर्णिमा को मकर संक्रांति पौष पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि यह सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का प्रारंभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन देवी शाकंभरी और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। देवी शाकंभरी को अन्न की देवी माना जाता है, इसलिए इस दिन अन्नदान का विशेष महत्व है।
इस त्योहार में पूर्णिमा के दिन चंद्र देव की पूजा की जाती है, क्योंकि आकाश में उनका पूर्ण रूप दिखाई देता है, जो उनकी दिव्य ऊर्जा से परिपूर्ण होता है। कहा जाता है कि पौष पूर्णिमा पर पवित्र स्नान, दान और ध्यान का फल कई गुना बढ़ जाता है।
पौष पूर्णिमा के साथ ही प्रयागराज में कल्पवास का पवित्र महीना भी शुरू होता है। पूरे महीने तक, हज़ारों लोग त्रिवेणी संगम के तट पर सादा और अनुशासित जीवन व्यतीत करते हैं। वे प्रार्थना, संयम और सेवा में अपना समय बिताते हैं। ऐसा माना जाता है कि कल्पवास का पालन करने से सभी पाप धुल जाते हैं और आत्मा मोक्ष के पथ पर अग्रसर होती है।
पौष पूर्णिमा व्रत कौन रख सकता है?
यह व्रत मुख्य रूप से शांति और आध्यात्मिक शुद्धि की कामना रखने वाले भक्तों द्वारा रखा जाता है। जिनकी कुंडली में चंद्रमा के अशुभ प्रभाव हैं, उनके लिए यह व्रत विशेष महत्व रखता है। साथ ही, जो लोग पुण्य अर्जित करना चाहते हैं और अपने पिछले पापों को मिटाना चाहते हैं, उन्हें भी पौष पूर्णिमा का व्रत रखना चाहिए।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन गंगा, यमुना और नर्मदा जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने से कई जन्मों के पाप धुल जाते हैं और हृदय शुद्ध होता है। जो भक्त तीर्थ यात्रा पर नहीं जा सकते, वे अपने स्नान के जल में गंगाजल मिला सकते हैं।
पौष पूर्णिमा 2026: तिथि और समय
2026 में, पौष पूर्णिमा शनिवार, 3 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी। पूर्णिमा तिथि 2 जनवरी 2026 को शाम 6:53 बजे से शुरू होकर 3 जनवरी 2026 को दोपहर 3:32 बजे तक रहेगी।
| कार्यक्रम | तिथि व समय |
|---|---|
| पौष पूर्णिमा की तिथि | 3 जनवरी 2026 (शनिवार) |
| पूर्णिमा तिथि प्रारंभ | 2 जनवरी 2026, शाम 06:53 बजे से |
| पूर्णिमा तिथि समाप्त | 3 जनवरी 2026, दोपहर 03:32 बजे तक |
| अभिजीत मुहूर्त (पूजा हेतु) | दोपहर 12:04 बजे से 12:46 बजे तक |
पौष पूर्णिमा व्रत की रीति-रिवाज (2026)
भक्त सूर्योदय से पहले पवित्र स्नान करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। फिर पूजा स्थल को स्वच्छ करके वहाँ भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करते हैं। फूल अर्पित करते हैं, घी का दीपक जलाते हैं और विष्णु मंत्रों का जाप करते हुए फल, मिठाई और दान की वस्तुएं अर्पित करते हैं।
समापन क्रिया
इस दिन की आध्यात्मिक प्रक्रियाओं का समापन सत्यनारायण कथा के श्रवण या पाठ और आरती के साथ किया जाता है। पौष पूर्णिमा पर प्रचलित कुछ मंत्र इस प्रकार हैं:
- ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।
- ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद।
- ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।
- ॐ श्रीं श्रीं कमल कमलालये प्रसीद प्रसीद।
- ॐ श्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।
FAQs
पौष पूर्णिमा 2026 कब है?
पौष पूर्णिमा 2026 शनिवार, 3 जनवरी को मनाई जाएगी। पूर्णिमा तिथि 2 जनवरी 2026 को शाम 6:53 बजे से शुरू होकर 3 जनवरी 2026 को दोपहर 3:32 बजे तक रहेगी।
पौष पूर्णिमा व्रत का क्या महत्व है?
पौष पूर्णिमा व्रत को हिंदू धर्म में अत्यधिक पवित्र माना जाता है। इस दिन देवी शाकंभरी और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत आध्यात्मिक शुद्धि और पुण्य अर्जित करने के लिए रखा जाता है।
पौष पूर्णिमा के दिन कौन-कौन से धार्मिक कार्य किए जाते हैं?
पौष पूर्णिमा के दिन भक्त पवित्र स्नान करते हैं, सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं, भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं और सत्यनारायण कथा का श्रवण या पाठ करते हैं।
पौष पूर्णिमा का संबंध मकर संक्रांति से कैसे है?
पौष पूर्णिमा को मकर संक्रांति पौष पूर्णिमा भी कहा जाता है क्योंकि यह सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का प्रारंभ माना जाता है।
पौष पूर्णिमा पर स्नान का क्या महत्व है?
पौष पूर्णिमा पर गंगा, यमुना और नर्मदा जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने से कई जन्मों के पाप धुल जाते हैं और हृदय शुद्ध होता है।
