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जन्माष्टमी स्पेशल: श्री कृष्ण जन्म लीला और जीवन दर्शन

जन्माष्टमी स्पेशल: श्री कृष्ण जन्म लीला और जीवन दर्शन

अवतरण की भूमिका – वैसे तो कई पौराणिक ग्रथों में भगवान श्री कृष्ण के जन्म का वर्णन मिलता है। लेकिन जनमानस में प्रचलित स्कंद पुराण के अनुसार भगवान विष्णु ने द्वापर युग में धरती पर बढ़ते अधर्म और अत्याचारों से मानवता को बचाने लिए वासुदेव-देवकी के यहां 8वें पुत्र के रूप में जन्म लिया। पुराण में बताया गया है कि देवकी और वासुदेव को देवकी के भाई कंस ने एक आकाशवाणी के बाद बंदी बना लिया था। इस आकाशवाणी के अनुसार वासुदेव और देवकी का 8वां पुत्र ही कंस की मौत का कारण बनेगा। इसलिए कंस ने देवकी और वासुदेव के 7 शिशुओं को जन्म के बाद ही मौत के घाट उतार दिया था।

कृष्ण अवतार अवतरण और महिमा……..

बताया जाता है जब भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ तब अपने आप ही कारागार के दरवाजे और देवकी-वासुदेव की बेड़ियां खुल गई। सभी पहरेदार गहरी नींद में चले गए। काले बादलों ने पूरे आसमान को घेर लिया, हवाएं तूफान में बदल गई, आसमान से बिजली धरती की छाती भेदने लगी, और कंस के डर से वासुदेव, देवकी विलाप के बावजूद भी नवजात कृष्ण को एक टोकरी में रख मथुरा से नंदगांव की ओर लेकर चल पड़े।

लेकिन यहां वासुदेव का रास्ता यमुना रोके खड़ी थी, जिसे इस भयवाह बारिश में पार करना लगभग नामुमकिन था लेकिन जैसे ही वासुदेव ने अपना पहला कदम यमुना में रखा मां यमुना ने उन्हे रास्ता देना शुरू कर दिया, शेषनाग छत्र बन प्रभु की रक्षा करने लगा। अब कंघों तक बहते पानी में वासुदेव नवजात कृष्ण को लेकर नंदगांव की तरफ बढ़ने लगते है। नंदगांव पहंुच वे नवजात को तुलसी के पास सो रही अपनी बहन यशोदा के पास छोड़ पुनः मथुरा आ जाते है। वासुदेव के मथुरा पहंुचते ही सब कुछ पुनः सामान्य हो जाता है।

कृष्ण बाल लीला…….जसोदा हरि पालनै झुलावै।हलरावै दुलरावै मल्हावै जोइ सोइ कुछ गावै।।ये पंक्तियां भगवान श्री कृष्णा के बाल रूप का बखूबी वर्णन करती है। परमभक्त कविराज सूरदास द्वारा रचित इन पंक्तियों में मां जसोदा बालक कृष्ण को सुलाने की कोशिश कर रही है। जसोदा कभी पालने को झूला देती है, कभी बाल गोपाल को प्यार करने लगती है। ऐसा करते हुए वे अनायास गुनगुनाती जा रही है। कविराज सूरदास ने अपनी अनेक कविताओं में भगवान कृष्ण की बाल-लीला का बहुत ही सुंदर उल्लेख किया है।

मैं क्या वस्फ. कहुं यारो उस श्याम बरन अवतारी के।श्री कृष्ण, कन्हैया, मुरलीधर मनमोहन, कुंज बिहारी के।।
बाल काल से ही नटखट और शरारती कृष्ण ने अपनी महीमा दिखाना शुरू कर दिया था। जहां एक ओर उन्होंने बकासुर और पूतना जैसे खतरनाक रक्षसों का संहार किया वहीं दूसरी ओर कालिया जैसे विशालकाय नाग को भी सबक सिखाया। तरूणावस्था में उन्होंने कंस का संहार कर अपने माता पिता को वर्षों की कैद से आजाद कराया। लेकिन अभी विष्णु अवतार का उद्देश्य अधूरा था जो पूरा होता है कौरव-पांडवों के युद्ध से जहां उन्होंने कुरूक्षेत्र के मैदान में अपने मित्र अर्जुन को 7 दिनों तक गीता का ज्ञान दिया। दुनियाभर में इसे श्रीमद्भगवत गीता के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध के माध्यम से उन्होंने दुनिया को बताया कि धर्म क्या है ? और उसका अनुसरण करते हुए कई बार कुछ ऐसे फैसले लेने होते है जो आपको दुख पहंुचा सकते है लेकिन आपको धर्म के मार्ग पर अडिग रहते हुए सत्य का अनुसरण करना चाहिए। इसी युद्धक्षेत्र में वे अपने अवतरण का उद्ेश्य इस श्लोक से समझाते है।

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।।

इस श्लोक में विष्णु अवतार श्री कृष्ण कहते हैं, हे भारत (अर्जुन) वास्तव में जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है तब-तब मैं किसी ना किसी रूप में लोगों के सामने प्रकट होता रहा हूं। अगले श्लोक में वे कहते है, मैं साधूओं का उद्धार करने, पापियों, अधर्मियों का विनाश करने और धर्म की स्थापना के लिए युगों-युगों से जन्म लेता रहा हूं।
भागवान श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन दर्शन इसी श्लोक में समाहित है। इस श्लोक में वे बताते है कैसे अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना के लिए वे सनातन काल से जन्म लेते रहे है और भविष्य में भी जरूरत पढ़ने पर वे धरती पर अवतरित होते रहेंगे।

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Acharya Aditya

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