प्रदोष व्रत 2020 – व्रत कथा, विधि, तिथि एवं लाभ


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हमारा देश भारत विविधताओं का देश है। लेकिन विविधताओं के बावजूद भी यहाँ सब लोग एकता से रहते हैं। भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जहाँ असंख्य व्रत, त्यौहार और उप-त्यौहार मनाते हैं। उन त्योहारों में कई लोग पूर्ण या आंशिक रूप से व्रत या उपवास भी रखते हैं। उनमें से एक है प्रदोष व्रत (उपवास), जिसे सबसे पहले भगवान शिव ने मनाया था और इसे बहुत फलदायी भी माना जाता है। इस उपवास को कोई भी महिला या पुरुष कर सकते हैं, जो अपनी इच्छाओं को पूरा करना चाहते हों। प्रदोष व्रत, जिसे दक्षिण भारत में प्रदोषम के नाम से भी जाना जाता है, भगवान शिव का आशीर्वाद पाने के लिए रखा जाता है।

प्रदोष व्रत कब मनाया जाता है?

एक माह या वर्ष में पड़ने वाली प्रत्येक त्रयोदसी को प्रदोष व्रत मनाया जाता है। अर्थात हिंदू संस्कृति में प्रत्येक महीने के दोनों पखवाड़ों के दौरान पड़ने वाली त्रयोदसी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। तदानुसार अगला प्रदोष व्रत 6 फरवरी 2020 को पड़ेगा। प्रदोष व्रत प्रत्येक हिंदी माह के शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को इसलिए मनाया जाता है, क्योंकि यह समय दिन और रात के मिलन की बेला होती है, इसलिए इस उपवास को अति उत्तम माना जाता है।


प्रदोष व्रत दिवस का नाम, महत्व और लाभ

  • जब प्रदोष रविवार को पड़ता है तो इसे ‘भानु प्रदोष’ के नाम से जाना जाता है। यह एक सुखी, शांतिपूर्ण और लंबे जीवन के लिए किया जाता है।
  • जब प्रदोष सोमवार को होता है तो इसे ‘सोम प्रदोष’ के नाम से जाना जाता है। यह वांछित परिणाम और सकारात्मकता प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
  • जब प्रदोष मंगलवार को होता है तो इसे ‘भौम प्रदोष’ के नाम से जाना जाता है। यह स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दूर करने और समृद्धि के लिए किया जाता है।
  • जब प्रदोष बुधवार को होता है तो इसे ‘सौम्यवार प्रदोष’ के नाम से जाना जाता है। यह ज्ञान और शिक्षा प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
  • जब प्रदोष गुरुवार को होता है तो इसे ‘गुरुवार प्रदोष’ के नाम से जाना जाता है। यह पूर्वजों से आशीर्वाद, दुश्मनों और संकटों से बचने के लिए किया जाता है।
  • जब प्रदोष शुक्रवार को होता है तो इसे ‘भृगुवार प्रदोष’ के नाम से जाना जाता है। यह धन, संपत्ति, सौभाग्य और जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
  • जब प्रदोष शनिवार को होता है तो इसे ‘शनि प्रदोष’ के नाम से जाना जाता है। यह नौकरी में प्रमोशन और करियर में प्रगति पाने के लिए किया जाता है।
इसका अर्थ यह है कि जिस वार को प्रदोष तिथि होती है, व्रत उस वार के अनुसार मनाया जाता है।

प्रदोष व्रत कथा

एक राजकुमार की असहनीय पीड़ा
प्राचीन काल की बात है, किसी गाँव में एक गरीब पुजारी रहता था। किसी कारण वश उस पुजारी की मृत्यु हो गयी। उस पुजारी की मृत्यु के बाद, उसकी विधवा पत्नी और बेटा घर-घर जाकर भिक्षा माँगते थे, और शाम को घर लौट आते थे। कुछ इसी तरह में अपना जीवन गुजर-बसर कर रहे थे। एक दिन, उस विधवा की भेंट विदर्भ क्षेत्र के राजकुमार से हुई। वह राजकुमार भी अपने पिता की मृत्यु के बाद से ही वहाँ भटक रहा था। पुजारी की विधवा ने राजकुमार की पीड़ा को समझा और उसे इस स्थिति में देख कर दुखी हो गयी। इसलिए वह उसे अपने घर ले आई और अपने बेटे की तरह ही उसकी देखभाल करने लगी।
 
शांडिल्य ऋषि ने बताया कि कैसे भगवान शिव ने प्रदोष व्रत का पालन किया: कुछ समय व्यतीत हो जाने के बाद एक दिन, विधवा अपने दोनों बेटों के साथ शांडिल्य ऋषि के आश्रम में पहुंची। वहाँ उसने शांडिल्य ऋषि से शिव के प्रदोष व्रत की कथा, अनुष्ठान और उपवास के बारे में सुना। घर लौटने के बाद वह भी प्रदोष व्रत का पालन करने लगी। धार्मिक अनुष्ठान करने से हमें देवताओं से शक्ति और आशीर्वाद मिलता  है। ज्योतिष की सहायता से हम ईश्वरीय कृपा भी प्राप्त कर सकते हैं। क्या आप अपने भविष्य को जान कर उसे सुधारना चाहते हैं? यदि हाँ, तो आज ही अपनी जन्मपत्री प्राप्त करें जीवन को सुखी बनायें अभी!

जब राजकुमार का सामना गंधर्व लड़कियों से हुआ
कुछ समय के बाद विधवा के दोनों बच्चे जंगल में खेल रहे थे, उसी समय उनका सामना कुछ गंधर्व लड़कियों से हुआ। तो राजकुमार उन लड़कियों से बात करने लगा जबकि पुजारी का बेटा घर लौट आया। उन लड़कियों में से एक लड़की का एक नाम अंशुमती था। उस दिन राजकुमार देर से घर लौटा।

जब विदर्भ के राजकुमार को पहचान लिया गया
अगले दिन, राजकुमार पुनः उसी स्थान पर गया, और देखा कि अंशुमती अपने माता-पिता से वार्तालाप कर रही थी। उसने राजकुमार को पहचान लिया था और बताया कि वह विदर्भ नगर का राजकुमार है, और उसका नाम धर्म गुप्त है। अंशुमती के माता-पिता ने राजकुमार को पसंद किया और कहा कि भगवान शिव की कृपा से वे अपनी बेटी की शादी उसके साथ करना चाहते हैं, और उससे पूछा कि क्या वह तैयार हैं?

विदर्भ के राजकुमार ने गंधर्व कुमारी अंशुमती से विवाह किया
राजकुमार ने अपनी स्वीकृति दी और विवाह संपन्न हुआ। बाद में, राजकुमार ने गंधर्वों की एक विशाल सेना के साथ विदर्भ पर हमला किया। भयंकर युद्ध हुआ और उसने वो युद्ध जीत कर विदर्भ पर शासन करने लगा। बाद में, वह पुजारी की विधवा और उसके बेटे को भी सम्मान के साथ अपने महल में ले आया। इसलिए, उनके सभी दुःख और दरिद्रता समाप्त हो गई और वे खुशी से रहने लगे। जिसका श्रेय प्रदोष व्रत को दिया गया।

प्रदोष व्रत का महत्व: उसी दिन से, लोगों में प्रदोष व्रत का महत्व और लोकप्रियता बढ़ गई और लोगों ने परंपराओं के अनुसार प्रदोष व्रत का पालन शुरू कर दिया।


प्रदोष व्रत विधि, उपाय और मंत्र

  • त्रयोदशी के दिन स्नान के करके स्वच्छ, सफेद वस्त्र धारण।
  • फिर भगवान के आसान को रंगीन कपड़ों से सजाएं।
  • चौकी पर भगवान गणेश, शिव-पार्वती की मूर्ति रखें और विधि अनुसार उनकी पूजा करें।
  • भगवान को नैवेद्य अर्पित करें और हवन करें।
  • परंपरा अनुसार प्रदोष व्रत हवन करते समय कम से कम 108 बार “ओउम उमा साहित शिवाय नम:” मंत्र का जाप करें।
  • श्रद्धा अनुसार अधिक से अधिक आहुति दें और पूरी श्रद्धा के साथ आरती करें।
  • तत्पश्चात् एक पुजारी को भोजन कराएं, और उसे कुछ दान करें।
  • अपने पूरे परिवार के साथ भगवान शिव और पुजारी का आशीर्वाद लें और सभी के साथ प्रसाद ग्रहण करें।


वर्ष 2020 के लिए प्रदोष व्रत तिथियां और पूजा का समय


क्रम संख्यातारीखवारव्रत का प्रकारसमय
108 जनवरीबुधवारसौम्यवार प्रदोष06:17 PM to 08:45 PM
222 जनवरीबुधवारसौम्यवार प्रदोष06:23 PM to 08:51 PM
306 फरवरीगुरुवारगुरुवार प्रदोष08:23 PM to 08:55 PM
420 फरवरीगुरुवारगुरुवार प्रदोष06:31 PM to 08:56 PM
507 मार्चशनिवारशनि प्रदोष06:31 PM to 08:55 PM
621 मार्चशनिवारशनि प्रदोष06:30 PM to 08:53 PM
705 अप्रैलरविवारभानु प्रदोष07:24 PM to 08:50 PM
820 अप्रैलसोमवारसोम प्रदोष06:29 PM to 08:49 PM
905 मईमंगलवारभौम प्रदोष06:30 PM to 08:48 PM
1019 मईमंगलवारभौम प्रदोष06:32 PM to 08:50 PM
1103 जूनबुधवारसौम्यवार प्रदोष06:35 PM to 08:52 PM
1218 जूनगुरुवारगुरुवार प्रदोष06:39 PM to 08:56 PM
1302 जुलाईगुरुवारगुरुवार प्रदोष06:42 PM to 08:59 PM
1418 जुलाईशनिवारशनि प्रदोष06:42 PM to 09:00 PM
151 अगस्तशनिवारशनि प्रदोष06:40 PM to 08:59 PM
1616 अगस्तरविवारभानु प्रदोष06:35 PM to 08:55 PM
1730 अगस्तरविवारभानु प्रदोष06:29 PM to 08:49 PM
1815 सितंबरमंगलवारभौम प्रदोष06:20 PM to 08:42 PM
1929 सितंबरमंगलवारभौम प्रदोष06:12 PM to 08:35 PM
2014 अक्टूबरबुधवारसौम्यवार प्रदोष06:04 PM to 08:29 PM
2128 अक्टूबरबुधवारसौम्यवार प्रदोष05:59 PM to 08:25 PM
2213 नवंबरशुक्रवारभृगुवार प्रदोष05:57 PM to 05:59 PM
2327 नवंबरशुक्रवारभृगुवार प्रदोष05:59 PM to 08:26 PM
2412 दिसंबरशनिवारशनि प्रदोष06:04 PM to 08:32 PM
2527 दिसंबररविवारभानु प्रदोष06:11 PM to 08:39 PM


प्रदोष व्रत में देवों के देव महादेव की आराधना की जाती है। प्रदोष व्रत का उद्यापन भी त्रयोदसी को ही किया जाता है। इसका उद्यापन 11 या 26 त्रयोदशी व्रत के बाद ही करना चाहिए। व्रत खोलने से एक दिन पूर्व विघ्नहर्ता श्री गणेश की पूजा किया जाता है, इस दिन बिना कोई अन्न-जल ग्रहण किये निर्जल रहकर व्रत किया जाता है। भगवान गणेश और शिव आपकी हर मनोकामना पूर्ण करें।

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गणेशजी की कृपा से,
गणेशस्पीक्स.कॉम टीम

06 Feb 2020


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