कांग्रेस-एनसीपी का रूख, शिवसेना को घुटनों पर लाने की रणनीति तो नहीं?


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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 के नतीजों के बाद से जारी राजनीतिक उठा-पटक के दौर का फिलहाल कोई पटाक्षेप होते नजर नहीं आ रहा, वहीं दूसरी ओर चुनावों की घोषणा बाद से ही सूबे में महायुति की सरकार का डिंडोरा पीट रही भाजपा-शिवसेना अपनी राजनीतिक पिपासा के लिए बहुमत होते हुए भी जन भावनाओं को नकारते नजर आई। दरअसल नतीजों के बाद से ही शिवसेना राज्य के मुख्यमंत्री पद का बराबर बटवांरा चाहती थी, सत्ता में 50 फीसदी हिस्सेदारी के लिए शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ दरवाजे के पीछे तय हुए किसी फार्मूले का हवाला दिया। हालांकि खुद अमित शाह ने ऐसे किसी भी वादे से इनकार किया। प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगने के बाद एक बैठक में हिस्सा लेते हुए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा, कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 के प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई बार मैने खुद भी जनसभाओं में फडणवीस के मुख्यमंत्री बनने की घोषणा की थी, तब किसी को इस कथित वादे की याद नहीं आई।

एनसीपी-कांग्रेस का खेल

महायुति के टूटने के बाद 56 विधायकों वाली शिवसेना ने तर्क दिया कि, प्रदेश की भलाई और जनमानस की भावनाओं का सम्मान करते हुए एनसीपी और कांग्रेस उसके साथ मिलकर सरकार में सझेदारी करेगी। ऐसे संकेत मिलते ही लंबे समय से सत्ता के सूखे का सामना कर रही एनसीपी और कांग्रेस की बांछे खिल गई। लेकिन एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने अपने लिए अनुकूल परिस्थिति तैयार करने के लिए शिवसेना के सामने एनडीए से अलग होने की कठिन शर्त रख दी। मुख्यमंत्री पद की लालसा पाले बैठी शिवसेना ने तुरंत अपने केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा करवा दिया। केंद्र की भाजपा सरकार ने भी लगे हाथ इस्तीफा स्वीकार कर शिवसेना के एनडीए से बाहर होने की घोषणा कर दी। इसके बाद जो परिस्थिती उभर कर सामने आई वह एनसीपी और कांग्रेस के लिए विन-विन सिचुएशन थी।

सत्ता की हठधर्मिता और पवार का मकड़जाल

सत्ता में बराबर की हिस्सेदारी की अपनी हठधर्मिता के कारण जहां एक ओर शिवसेना अपने 30 साल पुराने साथी से अलग होकर अधर में लटकी है। वहीं एनसीपी-कांग्रेस  चुनावों से पूर्व लगे अपने जख्मों को भरते नजर आए। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 की घोषणा के साथ ही महायुति ने कांग्रेस और खासकर एनसीपी के कई दिग्गज को तोड़कर अपने पाले में लाने का काम शुरू कर दिया था। इनमें विजयसिंह मोहिते पाटील, गणेश नाइक, उदयनराजे भोंसले, जयदत्त क्षीरसागर, मोहित पाटिल और एनसीपी अध्यक्ष दिलीप सोपल प्रमुख है। चुनावों की घोषणा के बाद हुई इस टूट ने एनसीपी प्रमुख शरद पवार को बहुत आहत किया था और चुनावों से एन पहले पार्टी के झगड़े जग जाहिर हो गए थे। जिसका खामियाजा पार्टी को कई सीटों पर उठाना पड़ा और परिणामों में एनसीपी 54 सीटों पर सिमटकर रह गई। लेकिन फिलहाल शिवसेना जिस सांप-छछुंदर वाली परिस्थिति का सामना कर रही है, उसकी प्रष्ठभूमि शरद पवार ने ही तैयार की है।

शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन में कई मुश्किलें

वैसे तो पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के इस्तीफे के बाद से ही अटकलें लगाई जा रही थी कि, एनसीपी-शिवसेना के साथ गठबंधन करेगी और कांग्रेस बाहर से अपना समर्थन देगी। बीते पखवाडे एनसीपी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस के भी सरकार में शामिल होने के संकेत देते हुए एक काॅमन मिनिमम प्रोग्राम के तहत सरकार गठन की संभावनाओं को हवा दी। लेकिन सोमवार को कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ हुई बहुप्रतिक्षित मुलाकात के बाद पवार के तेवर कुछ और ही नजर आए। उन्होंने  महाराष्ट्र में सरकार गठन की संभावनाओं को यह कहते हुए अधर में पहुंचाने का काम किया, कि सोनिया गांधी के साथ मुलाकात में सरकार गठन को लेकर कोई चर्चा नहीं की गई। पत्रकारों के सवाल का जवाब देते हुए पवार ने साफ कर दिया कि वे फिलहाल सरकार बनाने की जल्दबाजी में नहीं है और उनके पास 6 महीने का समय है।

शिवसेना का हिंदूत्वादी चेहरा, परंपरागत वोट और टूट का डर

सोनिया से मुलाकात के बाद पवार की पत्रकार वार्ता ने शिवसेना की मुश्किलें और बढ़ा दी। पवार के इस बयान ने 170 विधायकों के समर्थन से रोज सरकार बनाने का सपना देख रहे वरिष्ठ शिवसेना नेता संजय राउत को बेचैन कर दिया। उन्होंने पवार से मुलाकात करने के बाद मीडिया से कहते है कि पवार के बयानों के मायने समझने में 7 जन्म लग जाएंगे। दरअसल एनसीपी और कांग्रेस इस पशोपेश में है कि यदि सूबे में शिवसेना नित सरकार का समर्थन करते है तो यह उनके परंपागत वोट बैंक के साथ धोखा होगा, और आगामी महाराष्ट्र निकाय चुनाव 2022 और बीएमसी चुनावों में उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। साथ ही शिवसेना का कट्टर हिंदूवादी रूख भी दोनों की मुश्किलें बढ़ाने वाला है। शिवसेना के चुनावी वादों में कई ऐसे मुद्दे शामिल है जो कांग्रेस और एनसीपी की राजनीति केे विपरीत है। इसी के साथ प्रदेश के कई नेता शिवसेना को समर्थन देने के पक्ष में नहीं है इसका एक कारण चुनावों के पूर्व हुई टूट को माना जा रहा है। अगाड़ी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि इस गठबंधन से कांग्रेस और एनसीपी की जमीनी जड़ें कमजोर हो सकती है और दोनों ही पार्टियों को टूट का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी परिस्थिति में सवाल वही का वही है कि, क्या कांग्रेस-एनसीपी शिवसेना के साथ गठबंधन का जोखिम उठाएगी? या चुनाव घोषणा के बाद हुई अपनी टूट का बदला लेने के बाद शिवसेना को अधर में छोड़ देगी या कांग्रेस-एनसीपी का यह रवैया शिवसेना को घुटनों पर लाने की रणनीति का हिस्सा है? वजह जो भी हो फिलहाल इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल है कि आने वाले समय में महाराष्ट्र की राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा।

अमन वर्मा 
वेब डेस्क्
गणेशा स्पीक्स डाॅट काम

21 Nov 2019


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