बुद्ध पूर्णिमा 2020 – वैशाख पूर्णिमा के दिन घटी इन तीन घटनाओं ने सिद्धार्थ गौतम को बनाया बुद्ध


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भारत सहित एशिया और दुनिया के अन्य कई हिस्सों में वैशाख की पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। बौद्ध धर्म के लोगों के लिए बुद्ध पूर्णिमा का दिन बेहद खास और धार्मिक महत्व का होता है। मान्यताओं के अनुसार भगवान बुद्ध के जीवन में घटी तीन सबसे महत्वपूर्ण घटनाएं वैशाख की इसी पूर्णिमा को घटी जिसे हम बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाते है। यदि हम भगवान बुद्ध के जीवन को तीन हिस्सों में दखें तो, बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और बुद्ध का महानिर्वाण इन तीन महत्वपूर्ण घटनों के बीच ही उन्होंने अपने सभी महान उपदेश दुनिया तक पहुंचाये। साल 2020 में बुद्ध पूर्णिमा 7 मई को मनायी जायेगी। बुद्ध पूर्णिमा के पावन मौके पर हम ने बुद्ध पूर्णिमा का महत्व, बुद्ध पूर्णिमा क्यों मनायी जाती है, बुद्ध पूर्णिमा का धार्मिक महत्व सहित बुद्ध के जीवन के उन तीन प्रमुख पहलुओं को अपने पाठकों तक संक्षिप्त में पहुंचाने का प्रयास किया है, जिनके कारण भारत सहित दुनिया के कई बड़े देशों में बुद्ध पूर्णिमा का त्यौहार धूम धाम से मनाया जाता है। 
 

बुद्ध पूर्णिमा पर सिद्धार्थ गौतम का जन्म 

आज से लगभग 563 ई.पू मतलब, लगभग 2 हजार 500 साल पहले कपिल वस्तु के नजदीक लुंबिनी में शाख्य वंश  के राज शुद्धोधन के घर पुत्र का जन्म हुआ। वैशाख की पूर्णिमा के दिन राज वंश  में जन्मे बालक को नाम मिला सिद्धार्थ गौतम। सिद्धार्थ गौतम की माता का नाम महामाया था। कुछ बौद्ध ग्रंथों के अनुसार गौतम बुद्ध के पिता राजा शुद्धोधन को, ऋषियों और ज्योतिषियों के भविष्य कथनों के अनुसार, इस बात का ज्ञान था कि सिद्धार्थ सन्यास धारण कर सकते है। सिद्धार्थ को सन्यासी बनने से रोकने के लिए पिता ने कई प्रयास किये। उन्होंने महज 16 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ का विवाह करवा दिया। ताकि वैवाहिक जीवन और मोह माया में पड़ सिद्धार्थ सन्यास के बारे में सोच भी नहीं पाये। बुद्ध के जीवन के जुड़ी कई कहानियों में से एक में यह भी बताया गया है कि सन्यास ग्रहण करने के एक साल पहले जन्मे उनके पुत्र राहुल को उन्होंने अपने निर्वाण के मार्ग में बाधा माना था। लेकिन विधि के विधान के सामने सिद्धार्थ के पिता और सांसारिक मोह माया के प्रतिक राहु की एक न चली और सिद्धार्थ का समाना एक एक कर दुख, वृद्धावस्था और मृत्यु जैसी सच्चाइयों से हुआ। उसके बाद उन्होंने सन्यास का मार्ग चुना। 
 

बुद्ध पूर्णिमा पर ही सिद्धार्थ गौतम बने बुद्ध

महज 29 साल की उम्र में राज सिंहासन, अपनी पत्नी और बच्चे को छोड़ जीवन की सच्चाई, आत्म ज्ञान और मोक्ष के लिए सिद्धार्थ गौतम ने कपिल वस्तु के साथ अपनी कामना और इच्छाओं का भी त्याग कर दिया। सिद्धार्थ से बुद्ध की ओर बढ़े अपने पहले कदम को बुद्ध ने अनुमा का नाम दिया, जिसका अर्थ होता है ग्रह त्याग। सात सालों तक लगातार मन और तन से साधना करने के बाद उन्होंने मध्यम मार्ग का रास्ता चुना। बौद्ध धर्म के जानकारों के अनुसार बौद्ध धर्म का ताना बाना बुद्ध के मध्यम मार्ग के आसपास ही बुना गया है। मध्यम मार्ग के अनुसारण से वह दिन आया जब सन्यासी सिद्धार्थ गौतम को ज्ञान हुआ और वे बुद्ध कहलाये। अंतः आज के बिहार के गया जिले में एक पीपल के पेड़ के नीचे तपस्या करते हुए उन्हे मोक्ष का और मोक्ष तक पहुंचाने वाला ज्ञान प्राप्त हुआ। वे समबोधी कहलाये हिंदू धर्म में हम इस आत्मज्ञान की स्थिति कहा गया है। आत्मज्ञान वह विद्या है जिस पर चलकर व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर सकता है। जिस वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ उसे बोधी वृक्ष और उस जगह को बोधी गया के नाम से जाना जाता है। बौद्ध ग्रथों के अनुसार वैशाखकी पूर्णिमा के दिन ही बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसलिए इस दिन देश दुनिया के कई बौद्ध धर्म अनुयायी बोधी गया में एकत्र होते है। 
 

बुद्ध पूर्णिमा पर ही बुद्ध परिनिर्वाण 

सहबोधी होने के बाद भगवान बुद्ध ने अपने ज्ञान को अपने शिष्यों और प्राणी जगत को देना प्रारंभ किया, जिसे उन्होंने मध्यम मार्ग का नाम दिया। मध्यम मार्ग अर्थात सुख और दुख की अति के बीच का संतुलित मार्ग जो ज्ञान, शांति और दृष्टि देने वाला है। ये मध्यम मार्ग आठ अंगों वाला है, इनमें दृष्टि, संकल्प, वचन, स्मृति, प्रयत्न, जीविका और समाधी शामिल है। भगवान बुद्ध ने जहां अपना पहला उपदेश दिया उसे आज हम सारनाथ के नाम से जानते है। सारनाथ में दिये गये बुद्ध के इन उपदेषों को धर्मचक्र परिवर्तन या ध्म चक्र परिवर्तन के नाम से जाना जाता है। ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध ने लगभग 44 वर्षों तक धर्म उपदेश का ज्ञान दुनिया को दिया। लेकिन 80 साल की उम्र में वैशाख की पूर्णिमा के दिन कुशी नगर में बुद्ध ने समाधी के माध्यम से महानिर्वाण प्राप्त किया। 
 

भगवान विष्णु के नौवे अवतार 

सनातन धर्म में भगवान बुद्ध को विष्णु के नौवे अवतार के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसलिए हिंदू धर्म में इस दिन को भगवान विष्णु के छठे अवतार बुद्ध के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। बुद्ध पूर्णिमा के दिन विष्णु पूजा और विष्णु सहस्त्रनाम के पाठ का विशेष फल प्राप्त होता है। कुछ धर्म ग्रन्थों में वैशाख की इस पूर्णिमा को भगवान श्री कृष्ण और सुदामा की कहानी से भी जोड़ा गया है। मान्यताओं के अनुसार वैशाखकी इस पूर्णिमा के दिन भगवान कृष्ण ने अपने निर्धन मित्र सुदामा को उपवास रखने के लिए कहा था। वैशाख पूर्णिमा के व्रत से सुदामा की दरिद्रता दूर हुई। इसीलिए इसे सत्यव्रत पूर्णिमा भी कहा जाता है। कुछ धर्म ग्रन्थों के आधार पर पंडितों द्वारा सत्यव्रत पूर्णिमा के उपवास का खास महत्व बताया गया है। उनके अनुसार सत्यव्रत पूर्णिमा के दिन उपवास रख धर्मराज की पूजा करने से आर्थिक परेशानियों और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है।

05 May 2020


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