ज्योतिषशास्त्र के ग्रह: राहु-केतु

share
खगोलशास्त्रीय विवरण

वेदिक राहू और केतु वैदिक ज्योतिष में ગ્રહો ग्रह के रूप में स्वीकारे गए हैं। उनका कोई आकार नहीं है लेकिन संवेदनशील बिन्दुओं की गणितीय गणना का पृथ्वी वासियों पर बहुत प्रभाव पड़ा है।

चन्द्रमा अपनी कक्षा में दक्षिण से उत्तर की ओर है जो सूर्य के प्रभामंडल को पार करता हुआ है, चक्कर लगाता है। प्रतिच्छेदन का यही बिंदु राहू के नाम से जाना जाता है। इस बिंदु से 180 डिग्री दूर चन्द्रमा सूर्य के प्रभामंडल को उत्तर से दक्षिण की ओर काटता है। यह बिंदु केतु कहलाता है।

राहू और केतु हमारे ज्योतिष पद्धति में बिलकुल विलक्षण हैं। क्योंकि प्रभामंडल के परिच्छेदन बिंदु पर इतना तनाव मिलता है यह समझा जा सकता है। जबकि सूर्य शरीर और चन्द्र मस्तिष्क है और उनका प्रतिच्छेदन भारी प्रभाव देता है।

राहू और केतु अंतरिक्ष में स्थिर नहीं हैं लेकिन उनकी धीमी गति एक साल में लगभग 19डिग्री और 30 मिनट है। इसका अर्थ यह हुआ की इसे पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करने में लगभग 18 साल 6 महीने लगते हैं। यह गति पीछे जाने वाली है। एक मध्यम राहू और सत्य राहू की अवधारण है। हिन्दू ज्योतिष में हम राहू और केतु की वास्तविक स्थिति को लेते हैं।

पौराणिकता

यह कहानी समुद्र मंथन से जुड़ी है। देव और असुरों को अमृत मिला। भगवन विष्णु ने अमृत को असुरों से बचाने की युक्ति सोची। उन्होंने मोहिनी का रूप धरा और देवताओं और दैत्यों अलग अलग बिठाकर अमृत पान कराने लगे। एक असुर स्वरभानू को कुछ संदेह हुआ। उसने देवताओं का रूप धरा और चन्द्र और सूर्य के बीच जाकर बैठ गया। जब मोहिनी रूप धरे विष्णु उन्हें अमृत पिलाने लगे तब चन्द्र और सूर्य ने उस पहचान लिया और कहा कि यह तो असुर है। तब विष्णु भगवान ने अपने चक्र से उसका सिर और धड़ अलग का दिया। इस बीच अमृत के कुछ बूंद उसके मुंह में जा चूका था इसलिए सिर और धड़ अलग होकर भी अमर हो गया। असुर का वही सिर राहू और पूंछ यानि धड़ केतु कहलाया।
स्वरभानू की मां सिमिहिका उसका सिर उठाकर ले गई और धैर्यपूर्वक उसकी देखभाल की। एक समय के बाद सिर को सर्पिला धड़ मिल गया और वह राहू कहलाया। असुर का धड़ एक मिनी नाम का ब्राह्मण ले गया। वह अपने बेटे के लिए ले गया था। भगवन विष्णु ने उसे सर्पिला सिर दिया। यही केतु बना जो समय के साथ संत बन गया।
राहू और केतु ने सूर्य और चन्द्र को उसका भेद खोलने के लिए क्षमा नहीं किया और उनके ग्रहण का कारण बना।

ज्योतिषीय महत्त्व

उत्तर काल अमृत के अनुसार राहू निम्न के द्योतक है-

1. गलत तर्क 2. कठोर वक्तव्य 3. चंडाल4. नास्तिक व्यक्ति 5. विदेश यात्रा को जाना 6. गन्दगी 7. हड्डी 8. पेट का अल्सर 9. झूठ 10. दक्षिण पश्चिम दिशा 11. सर्पिला 12. बुढ़ापा 13. नाना 14. वाण दुर्गा की पूजा 15. उर्दू और पारसी लिखना (क्योंकि ये दोनों भाषा दाहिनी ओर से शुरू होती हैं, उलटे तरीके से लिखी जाती हैं, जैसे राहू और केतु का राशिचक्र में गति है, जो उलटी गति है ) 16. सांस लेना 17. तेज दर्द

यह देखा गया है की सबल राहू उपर्युक्त के लिए अच्छा होता है और दुर्बल राहू इसके उल्टा होता है।

केतु

उत्तर काल अमृत के अनुसार केतु निम्न के लिए सार्थक है

1. चंडी, गणेश आदि की पूजा 2. चिकित्सक 3. गिद्ध 4. अंतिम मुक्ति 5. खर्च 6. दर्दनाक बुखार 7. गणेश में स्नान 8. बहुत बड़ा दंड 9. वायु रोग 10. मंत्र शास्त्र 11. मस्तिष्क की अस्थिरता 12. पेट और आँख की बीमारी 13. वेदांत 14. दादा 15. चेचक 16. भगवान शिव का सेवक 17. शुद्र

यह देखा गया है कि सबल केतु अच्छे परिणाम देता है और कमजोर केतु जीवन में कई बाधाओं का कारण बनता है।

अन्य ज्योतिषीय विचार

राहू :

कन्या राशि राहू का घर है। यह वृषभ राशि में उच्च का और वृश्चिक में निम्न रहता है। हालांकि इसमें मतभेद हैं। कुछ लोग उच्च और निम्न बिंदु मिथुन और धनु को मानते हैं। यह कहा गया है की राहू अगर कर्क राशि में रहे तो योगकारक परिणाम देता है। हालांकि यह देखा गया है की एक छाया ग्रह हों के नाते राहू ग्रहों के प्रभाव के आधार पर परिणाम देता है। आम तौर पर देखा गया है कि एक शुभग्रह के साथ और शुभ प्रभाव बहुत अच्छा परिणाम देता है। यह सांसारिक सुख-सुविधा के लिए एक अच्छा ग्रह माना गया है। हालांकि राहू के साथ बहुत सी माया जुड़ी हुई है। आधुनिक काल में राहू कम्प्यूटर, इन्टरनेट और जन संचार का प्रतिनिधित्व करता है।
राहू बृहस्पति, शुक्र और शनि के साथ मित्रता रखता है। सूर्य और चन्द्र इसके शत्रु हैं और बुध के साथ निष्पक्ष रहता है।

केतु :

केतु वृश्चिक में उच्च का और वृषभ में निम्न का होता है। कुछ लोग उच्च और निम्न बिंदु धनु और मिथुन को मानते हैं। यह कहा गया है कि केतु का झुकाव आध्यात्मिक पक्ष की ओर अधिक है और यह अंतिम मुक्ति का कारण है जबकि राहू सांसारिक सुखों की ओर अधिक है। साथ ही यह भी कहा गया है कि छाया ग्रह संगति के अनुसार परिणाम देते हैं।
हालांकि बड़े पैमाने पर प्राचीन ग्रंथों में राहू और केतु के उच्च और निम्नता के संकेतों के बावजूद महत्वपूर्ण विवाद अभी भी बने हुए हैं।
केतु मंगल, शुक्र और शनि के साथ मित्रता, सूर्य और चन्द्र के साथ शत्रुता और बुध तथा बृहस्पति के साथ निष्पक्ष रहता है।
04 Sep 2012

दिलच्स्प विभाग

सारी राशियां

विशेषज्ञ ज्योतिषी, जिन को बेजन दारुवाला जी ने खुद प्रशिक्षण दिया है, आप को आप के करियर में मार्गदर्शन करेंगे